


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। श्रावणी मेला में हजारों कांवरिए बाबा धाम की ओर बढ़ रहे हैं। किसी के कंधे पर कांवर है, किसी के चेहरे पर थकान, किसी की आंखों में आस्था और किसी के होंठों पर सिर्फ ‘बोल बम’…
लेकिन मंगलवार को गांधी बिलारी कच्ची कांवरिया पथ पर इन दृश्यों को देखने का अंदाज थोड़ा अलग था।
15 युवा फोटोग्राफरों के हाथों में कैमरे थे और नजरें तलाश रही थीं – एक ऐसी तस्वीर, जो सिर्फ मेला न दिखाए, बल्कि उसकी कहानी भी कह सके।कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार के आम्रपाली कला प्रशिक्षण केंद्र, भागलपुर के फोटोग्राफी के छात्र-छात्राओं ने श्रावणी मेला 2026 को अपने कैमरों में कैद करने के लिए विशेष फोटो वॉक और फोटोग्राफी असाइनमेंट किया।
कैमरे में कैद हुआ ‘सावन का असली रंग’:
कांवरियों के कदम, श्रद्धालुओं की आस्था, रास्ते की हलचल, मेले की रौनक और कांवरिया पथ का जीवंत वातावरण। किसी ने पोट्रेट में चेहरे की कहानी खोजी, तो किसी ने स्ट्रीट फोटोग्राफी के जरिए मेले की धड़कन पकड़ने की कोशिश की। वहीं कुछ प्रशिक्षणार्थियों ने डॉक्यूमेंटरी फोटोग्राफी के जरिए कांवर यात्रा के उन पहलुओं को कैमरे में उतारा, जो अक्सर भीड़ में अनदेखे रह जाते हैं।
यानी इस फोटो वॉक में लक्ष्य सिर्फ ‘अच्छी तस्वीर’ लेना नहीं था। लक्ष्य था – एक तस्वीर में पूरी कहानी कह देना। ‘फोटो क्लिक’ से आगे की सीख
फोटोग्राफी प्रशिक्षक एवं जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन के निर्देशन में हुए इस फोटो वॉक में प्रशिक्षणार्थियों को मौके पर ही कैमरे की तकनीकी बारीकियां समझाई गईं।
प्रकाश कहां से आ रहा है। फ्रेम में क्या होना चाहिए और क्या नहीं।किस एंगल से तस्वीर ज्यादा प्रभावशाली बनेगी।फोकस कहां रखा जाए।एक्सपोजर कितना हो और सबसे महत्वपूर्ण-तस्वीर का असली विषय क्या है।
इन सवालों के जवाब प्रशिक्षणार्थियों को उसी वास्तविक माहौल में दिए गए, जहां हर सेकेंड एक नया फ्रेम बन रहा था।
प्रशिक्षणार्थियों को Rule of Thirds,Placement of Elements और Composition जैसी तकनीकों का व्यावहारिक अभ्यास कराया गया।
प्रशिक्षणार्थी शंकर के लिए यह अनुभव क्लासरूम से बिल्कुल अलग था। उनका कहना था कि वास्तविक परिस्थितियों में तकनीकों को आजमाने से फोटोग्राफी को समझना आसान हुआ और अलग-अलग परिस्थितियों में सही शॉट लेने का आत्मविश्वास बढ़ा।
वहीं आकृति ने बताया कि फोटो वॉक के दौरान कंपोजिशन की कई बारीकियां सीखने को मिलीं। खासकर Rule of Thirds और तस्वीर में Elements की सही Placement को मौके पर समझना उनके लिए बेहद उपयोगी रहा।
प्रशिक्षक बोले-कैमरा चलाना नहीं, नजर बनाना सीखें:
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी एवं फोटोग्राफी प्रशिक्षक अंकित रंजन ने कहा कि फोटोग्राफी सिर्फ कैमरा चलाने का हुनर नहीं है।’किसी दृश्य, व्यक्ति या घटना को एक प्रभावशाली नजरिए से प्रस्तुत करना ही असली फोटोग्राफी है।’उनके अनुसार वास्तविक परिवेश में अभ्यास से विद्यार्थियों को तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ रचनात्मक दृष्टि विकसित करने का मौका मिलता है। श्रावणी मेला जैसा विशाल जन-सांस्कृतिक आयोजन विद्यार्थियों के लिए इस लिहाज से एक खुली प्रयोगशाला की तरह है, जहां हर पल नया विषय और हर मोड़ पर नया फ्रेम मौजूद है।

अब क्लासरूम से निकलकर ‘सड़क’ बनी इनकी किताब:
आम्रपाली कला प्रशिक्षण केंद्र में फोटोग्राफी का निःशुल्क साप्ताहिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां छात्र-छात्राओं को कैमरा संचालन से लेकर प्रकाश, कंपोजिशन, पोट्रेट, स्ट्रीट और डॉक्यूमेंटरी फोटोग्राफी तक की बारीकियां सिखाई जाती हैं।लेकिन मंगलवार की फोटो वॉक ने इन विद्यार्थियों को एक और महत्वपूर्ण सबक दिया-फोटोग्राफी किताब पढ़कर नहीं, जिंदगी को देखकर भी सीखी जाती है।श्रावणी मेला की भीड़ में जहां हजारों लोग बाबा धाम की ओर बढ़ रहे थे, वहीं 15 कैमरे उन हजारों कहानियों में से अपनी-अपनी कहानी तलाश रहे थे।किसी कैमरे में शायद कांवरिया का थका हुआ चेहरा कैद हुआ होगा,किसी में मां की आंखों की आस्था’किसी में ‘बोल बम’ की गूंज और किसी तस्वीर में पूरा सावन। क्योंकि एक अच्छा फोटोग्राफर सिर्फ तस्वीर नहीं खींचता…वह गुजरते हुए पल को हमेशा के लिए रोक देता है।
















