


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। श्रावणी मेला में लाखों श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। भीड़, सुरक्षा और व्यवस्था के बीच महिला पुलिसकर्मी पूरी मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभा रही हैं। लेकिन इन वर्दीधारी माताओं की कहानी सिर्फ ड्यूटी की नहीं… ममता की भी है।

सुल्तानगंज- देवघर के रास्ते किसी की गोद में 6 महीने का मासूम है, तो किसी के साथ ढाई साल का नन्हा बच्चा। कहीं तीन साल का बच्चा अपनी मां के पास बैठा है। मां वर्दी में ड्यूटी पर तैनात है, लेकिन उसकी आंखों में हर पल अपने बच्चे की चिंता साफ दिखाई देती है।
एक तरफ बाबा बैद्यनाथ के भक्तों की सुरक्षा का फर्ज और दूसरी तरफ अपनी औलाद की मासूमियत को संभालने की जिम्मेदारी। वर्दी कहती है – ड्यूटी जरूरी है। मां का दिल कहता है – बच्चा भी जरूरी है।
शायद यही वजह है कि इन तस्वीरों को देखकर आंखें नम हो जाती हैं। जिस उम्र में बच्चे मां की गोद के बिना एक पल भी नहीं रह पाते, उसी उम्र में ये नन्हे बच्चे अपनी मां के साथ ड्यूटी की जगह पर हैं। मां कभी उन्हें गोद में उठाती है, कभी प्यार से देखती है और फिर उसी चेहरे पर जिम्मेदारी का भाव लाकर श्रद्धालुओं की सुरक्षा में जुट जाती है।
मां के लिए यह आसान नहीं। ड्यूटी के बीच भी शायद उसके कान बच्चे की हर आहट सुनते होंगे।
भीड़ में भी उसकी नजर अपने मासूम को तलाशती होगी और जब बच्चा मुस्कुरा देता होगा, तो शायद घंटों की थकान पलभर में मिट जाती होगी।
ये सिर्फ महिला पुलिसकर्मी नहीं हैं…ये वो मांएं हैं, जो अपनी ममता को दिल में रखकर कर्तव्य की राह पर चल रही हैं। बाबा बैद्यनाथ की सेवा में तैनात इन माताओं को दिल से सलाम।
क्योंकि मां अपनी नींद भूल सकती है,अपनी थकान भूल सकती है,अपनी तकलीफ छिपा सकती है।
लेकिन अपने बच्चे को कभी नहीं भूल सकती। मां तो मां होती है बाबू… वर्दी में हो या घर की चारदीवारी में,
उसके दिल में हमेशा बच्चा ही रहता है।
















