


@ वे समूह में हाथ जोड़कर खड़े हैं। नदी की ओर देखते हुए मन ही मन कहते हैं – ‘मां गंगे, अब तो लौट रही हो, रहम करो। हमारे खेत, हमारे घर, हमारे पशुधन और हमारी उम्मीदें अब तो सुरक्षित रहने दो।’
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। गंगा का पानी धीरे-धीरे अपने पुराने ठिकाने की ओर लौटने लगा है, लेकिन तटवर्ती गांवों में भय अब भी कायम है। नदी का घटता जलस्तर जहां ग्रामीणों के लिए थोड़ी राहत लेकर आया है, वहीं लौटती गंगा के साथ होने वाले कटाव की आशंका ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि गंगा के किनारे बसे गांवों में लोग अब भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं हो पा रहे हैं।

पशुपालक तिहरी वेदना से जूझ रहे हैं। खुद और परिवार, कोठी में रखे अनाज तथा अपने बेजुबान पशुओं को बचाने की जद्दोजहद में इनके दिन-रात कटते हैं। बाढ़ ने सिर्फ इंसानों की राह नहीं रोकी है, बल्कि पशुओं के लिए भी आफत बनकर आई है। जिले में करीब 4.74 लाख पशुओं की मौजूदगी सामने आई है। प्रभावित पशुओं की संख्या 79,390 दर्ज की गई है।
गंगा का स्वभाव ग्रामीणों के लिए नया नहीं है। वे जानते हैं कि नदी जब उफान पर होती है, तब तबाही का मंजर सामने आता है, लेकिन जब पानी लौटने लगता है, तब भी नदी का किनारा कई जगहों पर कमजोर होकर कटाव की चपेट में आ जाता है। खेत, खलिहान और घर-द्वार कब दरक जाएं, इसका भरोसा नहीं रहता। यही डर इन दिनों गंगा-कोसी के सीमाई इलाकों में लोगों के चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा है।
इसी भय और आस्था के बीच तटवर्ती ग्रामीण अब मां गंगा और कोसी को मनाने में जुट गए हैं। गांवों के लोग सामूहिक रूप से नदी के तट पर पहुंच रहे हैं और गंगा की धारा में दूध अर्पित कर पिंड की पूजा-अर्चना कर रहे हैं। उनके हाथों में दूध है, आंखों में चिंता और मन में एक ही प्रार्थना – हे मां गंगे, अब और कुछ मत लीलना।
ग्रामीणों की इस आस्था के पीछे केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि वर्षों से नदी के साथ जीने का अनुभव भी है। वे गंगा को मां मानते हैं, लेकिन उसी मां के बदलते मिजाज से सबसे अधिक भयभीत भी हैं। एक बार कटाव शुरू हुआ तो देखते ही देखते उपजाऊ जमीन नदी की धारा में समाने लगती है।
किसी किसान के लिए खेत का कट जाना केवल जमीन का छिन जाना नहीं है। उसके साथ उसकी साल भर की मेहनत, परिवार की उम्मीद और आने वाले दिनों की रोजी-रोटी भी बह जाती है। कई परिवारों के लिए तो नदी का कटाव पीढ़ियों से संजोया आशियाना तक छीन चुका है।
इसीलिए दूध अर्पित करते ग्रामीणों की जुबान पर बार-बार यही प्रार्थना सुनाई देती है – ‘मां, अबकी बार रहम करना।’ तट पर जब ग्रामीण एक साथ खड़े होकर गंगा की धारा में दूध अर्पित करते हैं, तो यह दृश्य अपने आप में बेहद मार्मिक हो उठता है। किसी के हाथ में लोटा है, किसी के हाथ में बाल्टी। कोई आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहा है तो कोई नदी की ओर टकटकी लगाए हुए है। उनके मन में यह उम्मीद है कि मां गंगा प्रसन्न होंगी और आने वाले दिनों में जनजीवन सहित उनके खेत-खलिहान और घर-द्वार सुरक्षित रहेंगे।
गंगा-कोसी के इलाकों में इन दिनों ऐसा दृश्य जगह-जगह देखने को मिल रहा है। नदी के किनारे रहने वाले लोगों के लिए गंगा केवल जलधारा नहीं, बल्कि उनके जीवन का हिस्सा है। इसी नदी से उनकी खेती जुड़ी है, उनकी आजीविका जुड़ी है और उनकी आस्था भी जुड़ी है। इसलिए जब नदी रूठती है तो वे उसे मनाने के लिए पूजा-अर्चना का सहारा लेते हैं और जब नदी शांत होती है तो उसके प्रति कृतज्ञता भी जताते हैं।
तट पर जलती धूप, शांत होती नदी और दूध अर्पित करते ग्रामीणों का दृश्य मानो एक ही कहानी कह रहा है – गंगा लौट रही है, लेकिन ग्रामीणों के मन से बाढ़ का भय अभी नहीं लौटा है।
वे समूह में हाथ जोड़कर खड़े हैं। नदी की ओर देखते हुए मन ही मन कहते हैं – ‘मां गंगे, अब तो लौट रही हो, रहम करो। अपने पुराने रास्ते पर चली जाओ… हमारे खेत, हमारे घर और हमारी उम्मीदें अब तो सुरक्षित रहने दो।’

















