


@ बदलते मौसम की चुनौती के बीच बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर बना नवाचार का केंद्र; AI, ड्रोन, GI उत्पाद, स्टार्टअप और मूल्य संवर्धन से किसानों के लिए तैयार हो रहा नया कृषि मॉडल।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कभी पारंपरिक खेती के लिए पहचाना जाने वाला बिहार अब भारतीय कृषि के भविष्य की नई प्रयोगशाला बनकर उभर रहा है। इस बदलाव के केंद्र में है बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर, जिसने अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और किसानों की जरूरतों को जोड़कर खेती का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो प्रयोगशाला से सीधे खेत और खेत से वैश्विक बाजार तक पहुँच रहा है।
जलवायु परिवर्तन, घटती जोत, बढ़ती उत्पादन लागत और बदलती बाजार मांग जैसी चुनौतियों के बीच विश्वविद्यालय ने खेती को अधिक वैज्ञानिक, टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। विश्वविद्यालय की विकसित तकनीकें अब केवल शोध पत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन रही हैं।
विश्वविद्यालय ने अब तक 53 उन्नत फसल किस्में और 80 से अधिक कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं। इनमें जलवायु अनुकूल फसलें, बेहतर बीज, आधुनिक खेती की तकनीकें और संसाधनों के कुशल उपयोग पर आधारित मॉडल शामिल हैं।
AI और ड्रोन से बदल रही खेती की तस्वीर:
बिहार कृषि विश्वविद्यालय खेती में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ड्रोन तकनीक के उपयोग को तेजी से बढ़ावा दे रहा है। AI आधारित तकनीकों से फसलों की निगरानी, रोगों की समय रहते पहचान और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल रही है। वहीं ड्रोन के माध्यम से फसलों पर उर्वरक और कीटनाशकों का सटीक छिड़काव कर लागत कम करने और उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में काम हो रहा है।
‘सबौर मॉडल’ बना नई पहचान:
विश्वविद्यालय का ‘सबौर मॉडल’ अनुसंधान से बाजार तक की पूरी मूल्य श्रृंखला पर आधारित है। इसमें प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को किसानों तक पहुँचाया जाता है, फिर मूल्य संवर्धन, स्टार्टअप, उद्योग, ब्रांडिंग और अंततः राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा जाता है। यही मॉडल बिहार को कृषि नवाचार और एग्री-उद्यमिता का नया केंद्र बना रहा है।
स्टार्टअप और युवाओं के लिए नए अवसर:
विश्वविद्यालय का Sabour Agribusiness Incubation Centre (SABAGRIS) कृषि आधारित स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित कर रहा है। यहाँ युवा उद्यमियों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और व्यवसाय विकसित करने का मंच उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे कृषि अब केवल उत्पादन नहीं बल्कि उद्यम का भी माध्यम बन रही है।
मखाना को दिला रहा वैश्विक पहचान:
विश्व में मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र बिहार है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने मखाने की उन्नत किस्मों, वैज्ञानिक खेती, आधुनिक प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के माध्यम से इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँचाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। विश्वविद्यालय का लक्ष्य मखाना को वैश्विक सुपरफूड के रूप में स्थापित करना है।

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह का कहना है कि संस्थान का उद्देश्य केवल गुणवत्तापूर्ण कृषि शिक्षा और अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार, उद्यमिता और किसानों की समृद्धि को बढ़ावा देना भी है। उनके अनुसार जलवायु परिवर्तन, AI, ड्रोन, प्रिसिजन फार्मिंग और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और भविष्य के अनुरूप बनाया जा रहा है।
बदलते समय में बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर यह साबित कर रहा है कि कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक, नवाचार और बाजार से जुड़े समग्र विकास मॉडल में छिपा है। यही कारण है कि सबौर आज केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि भारत की नई कृषि क्रांति का उभरता हुआ केंद्र बन चुका है।
















