


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। विक्रमशिला सेतु अब सिर्फ आवागमन का संकट नहीं, बल्कि सियासी सवालों का भी केंद्र बन गया है। पुल की मरम्मत और पुनर्स्थापना को लेकर सरकार जहां नवंबर तक भारी वाहनों का परिचालन शुरू कराने की तैयारी में है, वहीं सत्ता पक्ष के ही दो बड़े नेताओं के बयानों ने जिम्मेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल ने पुल के क्षतिग्रस्त होने को प्राकृतिक घटना बताते हुए कहा कि इसे किसी ने गिराया नहीं है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार जनता को परेशानी नहीं होने देगी और वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था पर भी विचार किया जाएगा। मंत्री के मुताबिक पर्व-त्योहार आते-जाते रहेंगे, लेकिन विकास कार्य समय पर पूरा करना भी जरूरी है।

मंत्री के बयान पर सांसद का पलटवार:
भागलपुर के जदयू सांसद अजय कुमार मंडल ने मंत्री के इस तर्क पर सीधे सवाल खड़े कर दिए। सांसद ने कहा कि विक्रमशिला सेतु की मौजूदा स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि विभागीय लापरवाही का नतीजा है।
सांसद का दावा है कि पुल की खराब स्थिति को लेकर उन्होंने करीब आठ महीने पहले ही पथ निर्माण विभाग को पत्र लिखकर आगाह किया था। उनके अनुसार, उस समय तकनीकी रिपोर्ट भी तैयार की गई थी, जिसमें जरूरी मरम्मत कार्यों का उल्लेख था।
‘राशि थी, फिर भी जमीन पर काम नहीं हुआ’:
अजय मंडल ने आरोप लगाया कि मरम्मत के लिए विभाग को राशि भी उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन जरूरी काम धरातल पर नहीं हुआ। उन्होंने कार्बन प्लेट, स्प्रिंग और एक्सपेंशन ज्वाइंट की जांच एवं मरम्मत का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कागजों पर काम दिखाकर राशि खर्च किए जाने का दावा किया गया, जबकि वास्तविक तकनीकी सुधार लंबित रहे।
सांसद के मुताबिक वाहनों के लगातार दबाव और झटकों से एक्सपेंशन ज्वाइंट पर लोड बढ़ता गया और आखिरकार सेतु की स्थिति गंभीर हो गई। उनका कहना है कि समय रहते तकनीकी खामियों को दूर कर दिया जाता तो संकट इतना बड़ा नहीं होता।
यह प्राकृतिक आपदा नहीं, लापरवाही की आपदा है:
सांसद ने मंत्री के ‘प्राकृतिक घटना’ वाले बयान को खारिज करते हुए कहा कि बादल फटने, भीषण बाढ़ या किसी प्रत्यक्ष प्राकृतिक आपदा में पुल बह जाता तो उसे प्राकृतिक आपदा माना जा सकता था। लेकिन तकनीकी खामियों और समय पर रखरखाव नहीं होने से स्थिति बिगड़ी है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। उनके शब्दों में, ‘यह प्राकृतिक आपदा नहीं, विभागीय लापरवाही की आपदा है।’
29 अगस्त से हटेगा बेली ब्रिज, बढ़ेगी चुनौती:
इधर, 29 अगस्त से बेली ब्रिज हटाकर विक्रमशिला सेतु के सब-स्ट्रक्चर और सुपर-स्ट्रक्चर पर काम शुरू करने की तैयारी है। सरकार का लक्ष्य नवंबर तक पुल को भारी वाहनों के परिचालन के लिए तैयार करना है।
हालांकि, त्योहारों का मौसम सामने है और गंगा का जलस्तर भी बढ़ रहा है। ऐसे में बेली ब्रिज हटने के बाद वैकल्पिक रास्तों का सवाल अहम हो गया है। भागलपुर के साथ पूर्वांचल और सीमांचल के बड़े हिस्से के लोगों की आवाजाही इस पुल पर निर्भर है। जलस्तर बढ़ने की स्थिति में नाव या जलमार्ग पर निर्भरता भी जोखिम से खाली नहीं होगी।
सरकार का दावा – नवंबर तक भारी वाहन चलेंगे:
ऊर्जा मंत्री ने सरकार की तैयारियों का हवाला देते हुए कहा कि काम तेजी से कराया जा रहा है और नवंबर तक विक्रमशिला सेतु को भारी वाहनों के परिचालन योग्य बनाने का लक्ष्य है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पुल क्षतिग्रस्त होने के बाद महज 28 दिनों में बेली ब्रिज तैयार कर आवागमन बहाल किया गया था।
अब चुनौती यह है कि मरम्मत का काम भी तेजी से हो और इस दौरान लाखों लोगों की आवाजाही भी प्रभावित न हो।
पंचकुला से भागलपुर पहुंचने लगे स्टील गर्डर:
विक्रमशिला पुल के पुनर्स्थापना कार्य की तैयारियां जमीन पर भी दिखाई देने लगी हैं। पंचकुला और मेरठ से दो सिक्स-एक्सेल ट्रकों में 19 स्टील गर्डर भागलपुर पहुंच चुके हैं। इन्हें एसपी सिंगला के महिला आईटीआई के पास बनाए गए कास्टिंग यार्ड में रखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि बाकी स्ट्रक्चर भी अगले सप्ताह तक पहुंच जाएंगे।
अब निगाह सिर्फ इस बात पर नहीं है कि विक्रमशिला पुल कब फिर मजबूत होकर खड़ा होगा, बल्कि इस पर भी है कि इसकी मौजूदा हालत के लिए आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी – प्रकृति की, व्यवस्था की या विभागीय लापरवाही की?
















