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कुश ग्रहण करने की धार्मिक परंपरा, पूरे वर्ष पूजा-पाठ और पितृकर्म में किया जाता है इस्तेमाल; स्नान, तर्पण, दान-पुण्य का भी है विधान

भागलपुर । भाद्रपद मास की अमावस्या को कुशाग्रहणी या कुशी अमावस्या कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह अमावस्या 11 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह करीब 10:33 बजे शुरू होकर 11 सितंबर को सुबह करीब 8:57 बजे तक रहेगी।

कुशाग्रहणी अमावस्या का सनातन परंपरा में विशेष महत्व माना गया है। इस दिन कुश घास को जड़ सहित ग्रहण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन प्राप्त की गई कुश का उपयोग पूरे वर्ष पितृ तर्पण, श्राद्ध, पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।

पितृ तर्पण में कुश का विशेष महत्व

अमावस्या की तिथि पितरों के स्मरण और तर्पण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार जल और काले तिल के साथ कुश का प्रयोग करते हुए पितरों का तर्पण किया जाता है। भाद्रपद अमावस्या के बाद पितृपक्ष आने के कारण भी इस तिथि को पितृ परंपरा से विशेष रूप से जोड़ा जाता है।

कुशाग्रहणी अमावस्या पर लोग स्नान, तर्पण, पूजा और दान-पुण्य करते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र आदि का दान करने तथा जीव-जंतुओं को भोजन कराने की धार्मिक परंपरा भी बताई गई है।

पूजा-पाठ और हवन में भी होता है प्रयोग

कुश का उपयोग केवल पितृकर्म तक सीमित नहीं है। विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में संकल्प लेने, हवन-यज्ञ और पूजा-पाठ के दौरान भी कुश का प्रयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विवाह, कन्यादान, कलश स्थापना और विभिन्न व्रत-अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग किया जाता है।

इसी कारण कुशाग्रहणी अमावस्या पर ग्रहण की गई कुश को पूरे वर्ष सुरक्षित रखने की परंपरा रही है।

कुश के तीन भागों में देवताओं का वास मानने की मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुश के मूल, मध्य और अग्रभाग में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव का वास माना गया है। इसी मान्यता के कारण धार्मिक अनुष्ठानों में कुश को विशेष पवित्रता प्रदान की गई है।

ध्यान और साधना से भी जुड़ा है कुश

कुश का संबंध पूजा और पितृकर्म के साथ-साथ ध्यान और साधना से भी माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में कुशासन का उल्लेख मिलता है। प्राचीन परंपरा में कुश से बने आसन पर बैठकर ध्यान और साधना करने की परंपरा रही है।

11 सितंबर को स्नान, तर्पण और दान का महत्व

11 सितंबर को कुशाग्रहणी अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालु सुबह स्नान कर पितरों का स्मरण और तर्पण कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन दान-पुण्य और सेवा कार्य करना भी शुभ माना जाता है। अमावस्या तिथि 11 सितंबर की सुबह तक रहने के कारण स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा और तर्पण की विधि एवं समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।

इस तरह 11 सितंबर की कुशाग्रहणी अमावस्या केवल कुश ग्रहण करने का दिन नहीं, बल्कि पितरों के प्रति श्रद्धा, धार्मिक अनुष्ठान, स्नान-दान और सेवा की परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है।

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