


@ टीएनबी कॉलेज के बड़ा बाबू के वेतन निर्धारण पर उठे गंभीर सवाल, रिटायर्ड अधिकारी ने पे फिक्सेशन कमिटी की भूमिका पर उठाई उंगली।
प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। टीएनबी कॉलेज, भागलपुर के बड़ा बाबू प्रकाश पाठक के वेतन एवं एरियर भुगतान को लेकर विश्वविद्यालय में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। रिटायर्ड प्रशाखा पदाधिकारी अमरेन्द्र कुमार झा ने दावा किया है कि सरकारी वेतन निर्धारण के नियमों की अनदेखी कर किए गए भुगतान के कारण मार्च 2026 तक 56.50 लाख रुपये वेतन मद में और 16.87 लाख रुपये एरियर मद में अधिक भुगतान हुआ है। उनका आरोप है कि इस मामले में 5 अगस्त को कुलपति, कुलसचिव और वित्त पदाधिकारी को विस्तृत प्रतिवेदन एवं भुगतान का चार्ट सौंपे जाने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
झा के अनुसार, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विश्वविद्यालय के पेमेंट एवं क्लेम सेक्शन में अनुकंपा नियुक्ति और वेतन निर्धारण से जुड़े सरकारी आदेश एवं रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, तो विश्वविद्यालय की स्टेट्यूटरी पे फिक्सेशन कमिटी ने उन्हीं रिकॉर्ड्स को नजरअंदाज कर किस आधार पर वेतन निर्धारण किया?
Level-6 की जगह Level-8 में फिक्सेशन का दावा
अमरेन्द्र कुमार झा ने अपने आरोप के समर्थन में कहा है कि वर्ष 1990 में राज्य सरकार की ओर से विश्वविद्यालय को भेजे गए आदेश में अनुकंपा पर नियुक्त तृतीय श्रेणी के कर्मियों को निर्धारित तृतीय श्रेणी के पद एवं वेतनमान में नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद विभिन्न वेतन आयोगों के दौरान भी एलडीसी के निर्धारित वेतनमान के अनुरूप वेतन निर्धारण किए जाने का प्रावधान रहा।
उनका दावा है कि 1 जनवरी 1996 के वेतन निर्धारण में एलडीसी के 3050-4590, 1 जनवरी 2006 में 5200-20200 एवं 1900 ग्रेड पे तथा 1 जनवरी 2016 से लेवल-6 के अनुरूप वेतन निर्धारण किया जाना चाहिए था। इसी आधार पर पीवीसी द्वारा पे-पर्ची जारी किए जाने की बात भी उन्होंने कही है।
लेकिन आरोप है कि बाद में स्टेट्यूटरी पे फिक्सेशन कमिटी ने तृतीय श्रेणी में अनुकंपा पर नियुक्त कर्मियों का वेतन एलडीसी के बजाय उससे ऊंचे पद के वेतनमान में निर्धारित कर दिया। झा का विशेष आरोप है कि सातवें वेतन निर्धारण के दौरान लेवल-6 की जगह लेवल-8 में फिक्सेशन किया गया।
सरकारी ग्रांट के इस्तेमाल पर भी सवाल:
रिटायर्ड प्रशाखा पदाधिकारी का कहना है कि गलत वेतन निर्धारण के कारण यदि लगातार अधिक भुगतान हुआ है तो इसका सीधा असर विश्वविद्यालय को मिलने वाली सरकारी ग्रांट पर पड़ता है। उन्होंने इसे सरकारी राशि के संभावित दुरुपयोग से जोड़ते हुए पूरे मामले की जांच की मांग की है।
झा के मुताबिक, उन्होंने प्रकाश पाठक की 5 अप्रैल 1997 की नियुक्ति तिथि से मार्च 2026 तक वेतन और एरियर का हिसाब तैयार किया। उनके आकलन के अनुसार वेतन मद में करीब 56.50 लाख रुपये तथा एरियर मद में 16.87 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान सामने आया है।
25 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप:
झा का कहना है कि 5 अगस्त 2026 को कुलपति सहित कुलसचिव और वित्त पदाधिकारी को इस संबंध में लिखित प्रतिवेदन सौंपा गया था। उनके अनुसार प्रतिवेदन दिए जाने के करीब 25 दिन बाद भी मामले में जांच अथवा भुगतान रोकने जैसी कार्रवाई नहीं की गई। उलटे जून-जुलाई में भी कथित अधिक भुगतान जारी रहने का दावा उन्होंने किया है।
अब सवाल सीधे विश्वविद्यालय प्रशासन से पूछा जा रहा है कि यदि प्रस्तुत दस्तावेजों और गणना में प्रथम दृष्टया अनियमितता दिखाई देती है, तो इसकी जांच क्यों नहीं कराई जा रही? क्या स्टेट्यूटरी पे फिक्सेशन कमिटी के निर्णयों की भी समीक्षा होगी और यदि अधिक भुगतान हुआ है तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी?
फिलहाल इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष सामने आना बाकी है। प्रशासन की प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही आरोपों की वास्तविकता और भुगतान निर्धारण की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

















