


लोक कला को नई पीढ़ी से जोड़ने और आधुनिक स्वरूप देने पर वक्ताओं ने दिया जोर
भागलपुर । अंग प्रदेश की प्रसिद्ध लोक कला मंजूषा को नई पहचान देने तथा युवा पीढ़ी को इससे जोड़ने के उद्देश्य से भागलपुर संग्रहालय, आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र एवं मंजूषा कला प्रशिक्षण केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मंजूषा समर कैंप के अंतर्गत निःशुल्क मंजूषा कला प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला का मंगलवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। पांच दिवसीय इस कार्यशाला का उद्घाटन जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन, मंजूषा गुरु मनोज पंडित तथा शिक्षाविद राजीवकांत मिश्रा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने कहा कि मंजूषा कला अंग प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार प्राचीन काल में चंपा नदी व्यापार, संस्कृति और सभ्यता की वाहक रही, उसी प्रकार मंजूषा कला भी अपने समय में समृद्धि और पहचान का प्रतीक रही है। समय के साथ यह कला कुछ हद तक उपेक्षित हुई, लेकिन आज इसे पुनर्जीवित करने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चंपा नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन की आवश्यकता है, उसी प्रकार मंजूषा कला को भी आधुनिक संदर्भों में नए प्रयोगों और नवाचारों की जरूरत है। इसी उद्देश्य से इस वर्ष की कार्यशाला का विषय ‘मंजूषा में नवाचार’ रखा गया है, ताकि कलाकार पारंपरिक शैली को बनाए रखते हुए नए विषयों और माध्यमों पर कार्य कर सकें।
शिक्षाविद राजीवकांत मिश्रा ने कहा कि मंजूषा कला को केवल पारंपरिक चित्रकला तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे दैनिक जीवन के विभिन्न उत्पादों और परिधानों से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि टी-शर्ट, साड़ी, टाई, बैग, गृह सज्जा सामग्री और अन्य आधुनिक उत्पादों पर मंजूषा कला का प्रयोग बढ़ेगा तो यह कला देश-विदेश में नई पहचान प्राप्त कर सकती है।
मंजूषा गुरु मनोज पंडित ने कहा कि मंजूषा कला को नए आयाम देने के लिए विषय-वस्तु में विस्तार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बिहुला-विषहरी लोकगाथा के अतिरिक्त सामाजिक, शैक्षणिक और समकालीन विषयों पर भी मंजूषा चित्रांकन किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि पूर्व में साइकिल योजना जैसे विषयों पर आधारित मंजूषा चित्रों को राज्य स्तर पर काफी सराहना मिली थी और अब राष्ट्रीय स्तर पर भी इस दिशा में संभावनाएं तलाश की जा रही हैं।
कार्यक्रम के दौरान मंजूषा गुरु मनोज पंडित एवं मंजूषा प्रशिक्षण केंद्र की छात्राओं द्वारा लोकनृत्य की मनमोहक प्रस्तुति भी दी गई, जिसने उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया। वहीं राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) पटना से आए फैशन कम्युनिकेशन के विद्यार्थियों ने भी कार्यशाला के पहले दिन मंजूषा कला की बारीकियों और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझा।
आयोजकों ने बताया कि 2 जून से 6 जून तक चलने वाली इस कार्यशाला में 50 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। प्रतिभागियों को मंजूषा कला की पारंपरिक शैली, रंग संयोजन, रेखांकन तथा आधुनिक प्रयोगों की विस्तृत जानकारी दी जाएगी। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागी विभिन्न नए विषयों पर आधारित मंजूषा कलाकृतियों का निर्माण करेंगे।
आयोजकों का मानना है कि यह कार्यशाला मंजूषा कला के संरक्षण, संवर्धन और आधुनिक रूपांतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी तथा युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।













