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@ JLNMCH भागलपुर के अध्ययन में 4,800 मरीजों में से 1,000 से अधिक में लॉन्ग कोविड जैसे लक्षण मिलने का दावा; विशेषज्ञों ने कहा – यह शुरुआती क्लीनिकल ऑब्जर्वेशन है, बड़े वैज्ञानिक शोध की जरूरत।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कोरोना महामारी भले ही अब बीते दौर की बात लगती हो, लेकिन उसके प्रभाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (JLNMCH) के मेडिसिन विभाग की एक क्लीनिकल स्टडी ने लॉन्ग कोविड (Long Covid) को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल के चिकित्सकों का दावा है कि पिछले तीन महीनों में जांचे गए हजारों मरीजों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की मिली, जिनमें लंबे समय तक बुखार, खांसी, कमजोरी और नसों से जुड़ी समस्याएं बनी रहीं तथा सामान्य दवाओं का अपेक्षित असर नहीं दिखा।
अस्पताल के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. राजकमल चौधरी के नेतृत्व में अप्रैल, मई और जून के दौरान इलाज के लिए पहुंचे करीब 4,800 मरीजों का अध्ययन किया गया। इनमें 1,000 से अधिक मरीजों में ऐसे लक्षण पाए गए, जिन्हें चिकित्सकों ने लॉन्ग कोविड से जुड़ा माना।
शरीर के ऊतकों में ‘वायरल अवशेष’ होने का दावा:
अध्ययन से जुड़े चिकित्सकों का कहना है कि कुछ मरीजों में कोरोना संक्रमण के बाद वायरस के निष्क्रिय अवशेष शरीर के विभिन्न ऊतकों में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। दावा किया गया है कि ये अवशेष हृदय, फेफड़ों, पेट की परतों और रीढ़ की हड्डी के आसपास के ऊतकों से जुड़े क्षेत्रों में मौजूद हो सकते हैं, जिससे मरीजों में लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रहती हैं।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह दावा अस्पताल के चिकित्सकों के क्लीनिकल ऑब्जर्वेशन पर आधारित है। इसे किसी बड़े, स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित वैज्ञानिक शोध के रूप में अभी स्थापित नहीं माना जा सकता।
एंटीबायोटिक क्यों नहीं कर रहीं असर:
चिकित्सकों के अनुसार कई मरीजों में लगातार बुखार, पैरों में जकड़न, नसों में तनाव, अत्यधिक थकान और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दिए। सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं से भी अपेक्षित सुधार नहीं हुआ और मरीजों को ठीक होने में कई सप्ताह लग गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि वायरल बीमारी पर एंटीबायोटिक दवाएं सीधे प्रभावी नहीं होतीं, क्योंकि एंटीबायोटिक बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में बीमारी के कारण की सही पहचान और लक्षणों के अनुसार उपचार अधिक महत्वपूर्ण होता है।
वैक्सीन लेने वालों में भी मिले लक्षण:
अध्ययन के अनुसार लॉन्ग कोविड जैसे लक्षण उन लोगों में भी देखे गए जिन्होंने कोविड वैक्सीन ली थी और उन लोगों में भी जिन्होंने वैक्सीन नहीं ली थी। हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि अध्ययन के दौरान यह स्थिति जानलेवा नहीं दिखी, लेकिन मरीजों के सामान्य जीवन और कार्यक्षमता पर इसका असर लंबे समय तक बना रह सकता है।
लॉन्ग कोविड क्या है:
लॉन्ग कोविड उस स्थिति को कहा जाता है, जब कोरोना संक्रमण समाप्त होने के बाद भी कई सप्ताह या महीनों तक मरीज में थकान, सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी, मांसपेशियों में दर्द, दिमागी धुंध (ब्रेन फॉग), नसों की समस्या या अन्य लक्षण बने रहते हैं। विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी इस स्थिति को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती मान चुके हैं, हालांकि इसके कारणों और उपचार पर शोध अभी जारी है।
बूस्टर डोज पर विचार की सलाह:
डॉ. राजकमल चौधरी के अनुसार फिलहाल ऐसी कोई दवा उपलब्ध नहीं है जो शरीर में मौजूद संभावित वायरल अवशेषों को पूरी तरह समाप्त कर सके। उन्होंने भविष्य में लॉन्ग कोविड से बचाव के लिए अतिरिक्त बूस्टर वैक्सीन जैसे विकल्पों पर नीति स्तर पर विचार किए जाने की बात कही।
सावधानी जरूरी, निष्कर्ष नहीं:
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि भागलपुर मेडिकल कॉलेज का यह अध्ययन लॉन्ग कोविड पर चर्चा को नई दिशा देता है, लेकिन इसके निष्कर्षों की पुष्टि के लिए बड़े स्तर पर वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रयोगशाला परीक्षण और सहकर्मी-समीक्षित (पीयर-रिव्यूड) शोध की आवश्यकता होगी। इसलिए मरीजों को किसी भी दावे के आधार पर घबराने के बजाय लंबे समय तक बुखार, कमजोरी या अन्य लक्षण बने रहने पर विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
















