


@ भक्ति में नई पीढ़ी का नया अंदाज, परंपरा और अनुशासन पर उठने लगे सवाल।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन की पगडंडियों पर कभी सिर्फ ‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ की गूंज सुनाई देती थी। हर कदम पर विनम्रता, हर जयकारे में श्रद्धा और हर स्वर में भोलेनाथ के प्रति समर्पण झलकता था। लेकिन अब कांवर यात्रा का रंग कुछ बदला-बदला नजर आने लगा है। भक्ति तो है, लेकिन उसके बोल बदल गए हैं। परिधान में नए फैशन का समावेश हो गया है। शिवभक्त अब भगवान से मान-मनुहार कम और सीधे संवाद, यहां तक कि चुनौती भरे अंदाज में जयकारे लगाते दिखाई दे रहे हैं।
कांवरियों के बीच इन दिनों ऐसे नारे सुनाई दे रहे हैं –
बाबा तुमको लाल सलाम…,बाबा तेरी तानाशाही नहीं चलेगी…,बाबा तुमको देना होगा…।जीतेगा भाई जीतेगा, चिलम छाप जीतेगा…।इन नारों ने पारंपरिक शिवभक्ति के स्वरूप पर नई बहस छेड़ दी है।
जब भक्ति में होती थी विनती:
पुराने कांवरियों के मुताबिक पहले यात्रा के दौरान जयकारों में श्रद्धा और विश्वास झलकता था। जैसे –
बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है।चलो बाबा के धाम, बनेंगे सबके बिगड़े काम।बाबा नगरिया दूर है, जाना जरूर है। बाबा-बाबा सब कहे मैया कहे न कोय। इन नारों में कहीं हठ नहीं था, बल्कि भोलेनाथ संग मैया पार्वती के प्रति समर्पण दिखाई देता था। अपने मनोकामना के लिए विनती दिखाई पड़ता था।
युवाओं की बढ़ती भागीदारी, बदलती तस्वीर:
ऐतिहासिक पड़ाव संघ के पूर्व अध्यक्ष जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता मानते हैं कि अब यात्रा में युवाओं और किशोरों की संख्या काफी बढ़ गई है। उनके अनुसार कुछ लोग नशे के प्रभाव में मनमर्जी के नारे लगाते हैं, जिससे यात्रा की आध्यात्मिक गरिमा प्रभावित होती है।
वर्षों से पैदल बाबा बासुकीनाथ जाने वाले भक्त गोरे यादव कहते हैं कि पहले कांवर यात्रा अनुशासन और नियमों की मिसाल होती थी, लेकिन अब उसका पालन कम होता दिख रहा है।
टूटती परंपराएं:
शिव भक्त मदन आर्या, मुकेश चौधरी, लट्टू शर्मा, अभिषेक लाल, वरुण भारती, विक्की यादव, बादल यादव बताते हैं कि पहले कांवर यात्रा के अपने कठोर नियम थे – पुनः यात्रा शुरू करने के क्रम में स्नान किए बिना कांवर नहीं उठाई जाती थी। यात्रा के दौरान झपकी यानी नींद आने पर स्नान जरूरी था। नमक वाले भोजन से परहेज किया जाता था।पीछे मुड़कर देखना, लौटना और चलते-चलते आगे से कंधा बदलना वर्जित माना जाता था। कुर्सी, खाट या बेंच पर बैठने से बचा जाता था। जमीन पर गमछा बिछाकर विश्राम करने की परंपरा थी। यात्रा दोबारा शुरू करने से पहले शुद्धि जल का छिड़काव किया जाता था। गेरुआ वस्त्र और सादगी यात्रा की पहचान थे। यात्रा के क्रम में श्रींगार वर्जित था।
आज तस्वीर बदल रही है। कांवर सजावटी हो गए हैं, गेरुए की जगह रंग-बिरंगे परिधान नजर आते हैं और कई युवा यात्रा के दौरान सजने-संवरने को भी प्राथमिकता देने लगे हैं। रात्रि विश्राम में चादर और तकिया का प्रयोग होने लगा है।
पड़ाव संघ की सख्ती:
बदलते माहौल को देखते हुए ऐतिहासिक पड़ाव संघ, कहलगांव ने अपनी 114वीं यात्रा को लेकर इस बार स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। पड़ाव संघ के अध्यक्ष अरबिंद सिंह, पड़ाव संघ ट्रस्ट के अध्यक्ष संतोष चौधरी ने कहा कि अनुशासन तोड़ने वाले कांवरियों को संघ की सुविधाएं नहीं मिलेंगी।देर रात अकेले यात्रा करने से मना किया गया है।जत्थे के साथ सामूहिक यात्रा पर जोर दिया गया है। साथ चलने वाले करीब पांच हजार कांवरियों पर सेवादल की निगरानी रहेगी।तय पड़ाव पर ही विश्राम करना होगा।सुबह-शाम की आरती में शामिल होना अनिवार्य रहेगा।
भक्ति बदली या अभिव्यक्ति:
कांवर यात्रा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा उत्सव है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले भक्त भोलेनाथ के सामने सिर झुकाकर अपनी बात कहते थे, अब नई पीढ़ी उसी बात को अलग अंदाज में कह रही है। सवाल यह है कि यह बदलाव केवल अभिव्यक्ति का है या फिर भक्ति की आत्मा भी बदल रही है।
फिलहाल इतना तय है कि सावन की राहों में ‘बोल बम’ की गूंज के साथ अब बदलते समय की आवाज भी साफ सुनाई देने लगी है।

















