


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कहते हैं, मंजिल तक पहुंचने के लिए कदम बढ़ाने पड़ते हैं… लेकिन जब मंजिल महादेव हों, तो कोई भक्त हर कदम पर अपना माथा धरकर भी सफर तय कर सकता है। त्रिशूल बाबा की दंडवत यात्रा इसी अद्भुत आस्था की कहानी कह रही है।
बाबा अजगैबीनाथ धाम से गंगाजल लेकर त्रिशूल बाबा एक बार फिर बाबा वैद्यनाथ धाम की ओर निकल पड़े हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह उनकी पहली यात्रा नहीं, बल्कि 90वीं दंडवत यात्रा है।

89 बार की कठिन तपस्या पूरी करने के बाद भी आस्था की यह लौ थमी नहीं है। उम्र की परवाह नहीं, रास्ते की कठिनाइयों की चिंता नहीं – हर बार शरीर जमीन पर झुकता है और विश्वास महादेव की ओर बढ़ता जाता है।
मंजिल अभी बाकी है… लक्ष्य 108 का:
त्रिशूल बाबा ने अपने जीवन में 108 बार दंडवत प्रणाम करते हुए बाबा वैद्यनाथ को जल अर्पित करने का संकल्प लिया है। 89 यात्राएं पूरी हो चुकी हैं।
90वीं यात्रा जारी है और अभी 18 यात्राओं का संकल्प बाकी है।
यह महज सुल्तानगंज से देवघर तक की दूरी नहीं है। यह उस विश्वास की यात्रा है, जिसमें हर दंडवत के साथ एक संकल्प दोहराया जाता है – जब तक शरीर साथ देगा, माथा महादेव की चौखट तक पहुंचता रहेगा।
हर दंडवत में एक कहानी:
सड़क पर आगे बढ़ता एक शरीर दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे 89 यात्राओं का अनुभव, वर्षों की साधना और महादेव के प्रति अटूट भरोसा छिपा है।
जहां आम इंसान कुछ कदम चलकर थक जाता है, वहीं त्रिशूल बाबा हर पड़ाव पर दंडवत प्रणाम कर अपनी यात्रा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए रास्ते की लंबाई शायद मायने नहीं रखती – मायने रखता है तो सिर्फ भोलेनाथ का धाम।
अब नजर 108वीं यात्रा पर है। 90वीं दंडवत यात्रा में निकले त्रिशूल बाबा की यह तपस्या आस्था की उस तस्वीर को सामने रखती है, जहां रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन संकल्प उससे भी बड़ा होता है।
89 बार झुका माथा… 90वीं बार फिर वही प्रण… और लक्ष्य – 108।
















