


@ वैसे सांसद अजय कुमार मंडल भी मानते हैं कि जिस तरह राघोपुर में कटाव निरोधी कार्या के नाम पर लूट-खसोट के जरिए करीब एक हजार करोड़ रुपये पानी में बहाया गया, उतनी राशि में तो बाढ़ पीड़ितों को अन्यत्र बसाया जा सकता था। गंगा की धार को अपने हिसाब से अविरल बहने दिया जाता।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। राघोपुर में गंगा का कटाव लोगों के घर, जमीन और भविष्य पर लगातार खतरा बनकर मंडरा रहा है। दूसरी ओर, कटावरोधी कार्यों को लेकर अब सवाल भी तेज होने लगे हैं। बिहपुर विधानसभा से महागठबंधन की पूर्व प्रत्याशी अर्पणा कुमारी ने भागलपुर के सांसद अजय कुमार मंडल से ऐसा सीधा सवाल दागा है, जिसका जवाब सिर्फ बयान से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले काम से देना होगा। वैसे सांसद अजय कुमार मंडल भी मानते हैं कि जिस तरह राघोपुर में कटाव के नाम पर लूट-खसोट के जरिए करीब एक हजार करोड़ रुपये पानी में बहाया गया, उतनी राशि में तो बाढ़ पीड़ितों को अन्यत्र बसाया जा सकता था। गंगा की धार को अपने हिसाब से अविरल बहने दिया जाता।

अर्पणा कुमारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सांसद से सवाल करते हुए कहा कि दिन में राघोपुर में कटावरोधी कार्य ‘युद्धस्तर’ पर दिखाई देता है, लेकिन रात होते ही आखिर यह युद्धस्तर किस बैरक में चला जाता है? उन्होंने सांसद से सीधा पूछा रात के समय राघोपुर को बचाने के लिए आखिर कितने प्रतिशत कटावरोधी काम हो रहा है? जनता को यह आंकड़ा ईमानदारी से बताया जाए।
सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि गंगा को न तो सरकारी कार्यालयों की टाइमिंग पता है और न ही उसे सूर्योदय-सूर्यास्त का कोई सरकारी आदेश मिला है। कटाव चौबीस घंटे है तो बचाव का प्रयास भी चौबीस घंटे क्यों नहीं? यही सवाल राघोपुर के हजारों लोगों के मन में है। एक सवाल और ‘कहीं मुंगेर से भागलपुर तक भविष्य की योजना ‘मरीन ड्राइव’ के निर्माण के नाम पर राघोपुरवासियों को उजाड़ने की यह साजिश तो नहीं?’
अर्पणा कुमारी ने आगे कहा कि यह सिर्फ उनका राजनीतिक सवाल नहीं है। यह उन परिवारों का सवाल है, जिनकी आंखों के सामने उनकी जमीन कट रही है और जिनके लिए गंगा की हर तेज धारा भविष्य की एक नई चिंता लेकर आती है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि दिन और रात के काम की रफ्तार में फर्क क्यों दिखाई देता है।उन्होंने ‘डबल इंजन सरकार’ पर भी तीखा व्यंग्य किया। उनका कहना है कि जिम्मेदारी केंद्र सरकार की हो या बिहार सरकार की, जनता को जिम्मेदारियों का फुटबॉल मैच नहीं, परिणाम चाहिए। जनता को यह सुनने में दिलचस्पी नहीं कि फाइल किस टेबल पर है और जिम्मेदारी किस विभाग की है। उसे बस यह देखना है कि राघोपुर बचेगा या नहीं।
भागलपुर के सांसद होने के नाते अजय कुमार मंडल की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अर्पणा ने कहा कि इस संकट के समय जनता को स्थिति की वास्तविक तस्वीर बताना सांसद की भी जिम्मेदारी है। लेकिन राघोपुर के सामने फिलहाल सबसे बड़ा सवाल विज्ञान की ताकत का नहीं, बल्कि सरकारी इच्छाशक्ति और काम की रफ्तार का है। अगर दिन में कटावरोधी काम ‘युद्धस्तर’ पर हो रहा है, तो रात में वही रफ्तार क्यों नहीं? क्या गंगा को रात में छुट्टी मिल जाती है? क्या कटाव अंधेरा होने के बाद रुक जाता है या फिर सरकारी युद्धस्तर भी सूरज के साथ ही ड्यूटी खत्म कर देता है?
राघोपुर के लोगों के लिए यह कोई राजनीतिक बयानबाजी या आरोप-प्रत्यारोप का मनोरंजन नहीं है। यहां सवाल किसी पोस्ट या प्रेस बयान की लोकप्रियता का नहीं, बल्कि घर, खेत, जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है। अर्पणा ने सांसद से जनता के इस सवाल का सीधा, स्पष्ट और ईमानदार जवाब देने की मांग की है।

क्योंकि अब जनता सिर्फ दिन के उजाले में दिखने वाले काम को नहीं देख रही है। रात के अंधेरे में क्या हो रहा है, उस पर भी उसकी निगाह है। और सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही है – गंगा चौबीस घंटे बह रही है, अब जनता पूछ रही है कि सरकार की ‘युद्धस्तरीय’ जिम्मेदारी आखिर कितने घंटे चलती है?
















