


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर।सम्मान मिला तो चेहरे पर खुशी थी, लेकिन शब्दों में उपलब्धि का गर्व कम और जिम्मेदारी का एहसास ज्यादा। चार दशक से पत्रकारिता और जनसरोकारों से जुड़े लेखन को समर्पित भागलपुर के स्वतंत्र पत्रकार कुमार कृष्णन के लिए बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में मिला डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ स्मृति-सम्मान महज एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि उनकी कलम के सामने खड़ी एक नई जिम्मेदारी का संकेत बन गया।

सम्मान प्राप्त करने के बाद कुमार कृष्णन ने कहा कि यह क्षण उनके लिए आत्मीय और भावपूर्ण है, लेकिन वे इसे व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देखते। उनके लिए यह सम्मान उन सवालों और सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता की स्वीकृति है, जिन्हें पत्रकारिता के जरिए लगातार सामने लाने की कोशिश की गई।
कुमार कृष्णन का मानना है कि पत्रकारिता की असली सार्थकता सुर्खियां बटोरने में नहीं, बल्कि उन आवाजों को जगह देने में है जो अक्सर व्यवस्था और समाज के शोर में दब जाती हैं। डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ की स्मृति से जुड़े इस सम्मान को उन्होंने इसी सोच को आगे बढ़ाने की प्रेरणा बताया। उनका कहना है कि लेखन और पत्रकारिता तभी सार्थक है, जब वह अनसुने सवालों को आवाज और वंचितों को अपनी बात कहने का मंच दे सके।
कुमार कृष्णन के लिए यह सम्मान चार दशक लंबी पत्रकारिता यात्रा में निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन वे इसे अंतिम मुकाम मानने को तैयार नहीं हैं। उनके शब्दों में, सम्मान जितना सुख देता है, उससे कहीं अधिक आगे बेहतर और जिम्मेदार काम करने का दबाव भी पैदा करता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘यह सम्मान मेरी यात्रा का पड़ाव नहीं, आगे की राह का दायित्व है।’
सम्मान के लिए कुमार कृष्णन ने बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ, न्यायमूर्ति मान्धाता सिंह, प्रो. रत्नेश्वर मिश्र, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के परीक्षा नियंत्रक डॉ. मनोज कुमार झा, डॉ. मीना झा, ब्रज किशोर पाठक सहित आयोजन से जुड़े सभी साहित्यकारों और आत्मीयजनों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया।
















