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100 वर्ष से अधिक पुराने श्रीकृष्ण मंदिर में धूमधाम से मनाया गया जन्मोत्सव, रोहिणी नक्षत्र व सर्वार्थ सिद्धि योग में हुआ कान्हा का प्राकट्य; रविवार को कंधे पर प्रतिमा लेकर गंगा घाट पहुंचेंगे ग्रामीण

नवगछिया के गोपालपुर प्रखंड के गोसाईंगांव स्थित 100 वर्ष से अधिक पुराने ऐतिहासिक श्रीकृष्ण मंदिर में शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को लेकर गोसाईंगांव सहित आसपास के गांवों में कई दिनों से उत्सवी माहौल बना हुआ था। जन्माष्टमी की शाम से ही प्राचीन श्रीकृष्ण मंदिर में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। देर रात तक मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से गुलजार रहा। जैसे ही मध्यरात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की बेला आई, पूरा मंदिर परिसर शंख, घंटी और घड़ियाल की ध्वनि के साथ ‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ और ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयघोष से गूंज उठा।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को जन्माष्टमी की बधाई दी। कई श्रद्धालुओं ने भगवान के बाल स्वरूप के दर्शन किए और उन्हें झूला झुलाया। जन्म के बाद मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।

आकर्षक सजावट से जगमगाया मंदिर परिसर

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर प्राचीन मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया था। पूरे मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी विद्युत रोशनी, फूलों और आकर्षक सजावट से सजाया गया था। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की आकर्षक झांकी भी सजाई गई थी, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रही।

शाम होते ही मंदिर और आसपास का इलाका रोशनी से जगमगा उठा। श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अर्चना और दर्शन की विशेष व्यवस्था की गई थी। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और संकीर्तन से देर रात तक भक्तिमय माहौल बना रहा।

रोहिणी नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग का रहा विशेष संयोग

इस वर्ष जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग के संयोग को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। ऐसे में इस वर्ष के संयोग को श्रद्धालुओं ने विशेष और शुभ माना।

मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पंचामृत अभिषेक कराया गया। भगवान को नए वस्त्र और आभूषणों से सजाया गया। इसके बाद विशेष महाआरती की गई और छप्पन भोग अर्पित किया गया।

जन्मोत्सव के दौरान मंदिर में मौजूद श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन नजर आए। जन्म की बेला में मंदिर में मौजूद लोगों ने शंख और घंटियां बजाकर भगवान का स्वागत किया।

सौ साल से चली आ रही है बांसुरी चढ़ाने की परंपरा

गोसाईंगांव का प्राचीन श्रीकृष्ण मंदिर सिर्फ अपनी उम्र और धार्मिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं के लिए भी आसपास के क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है। मंदिर से जुड़ी करीब सौ वर्ष पुरानी एक प्रमुख परंपरा भगवान श्रीकृष्ण को बांसुरी अर्पित करने की है।

स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण से सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होने के बाद भक्त उनके श्रीचरणों में बांसुरी चढ़ाते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार लकड़ी या चांदी की बांसुरी भगवान को अर्पित करते हैं। मंदिर में अर्पित की गई बांसुरियां लोगों की गहरी आस्था और इस परंपरा की पुरातनता की गवाही देती हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा चली आ रही है और आज भी लोग अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण के दरबार में बांसुरी अर्पित करते हैं।

रातभर भजन-कीर्तन और जागरण से भक्तिमय रहा माहौल

जन्माष्टमी की रात मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन, संकीर्तन और जागरण का आयोजन किया गया। स्थानीय मंडलियों और भजन गायकों ने भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान किया। भक्ति गीतों की धुन पर श्रद्धालु देर रात तक झूमते रहे।

मंदिर परिसर में आयोजित मेले को लेकर भी लोगों में खासा उत्साह रहा। आसपास के गांवों के लोग परिवार के साथ मंदिर पहुंचे। बच्चों और महिलाओं में मेले को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। मंदिर के आसपास देर रात तक चहल-पहल बनी रही।

जन्मोत्सव के बाद श्रद्धालुओं में बांटा गया महाप्रसाद

मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, पंचामृत अभिषेक और महाआरती के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। माखन-मिश्री, पंजीरी सहित अन्य प्रसाद श्रद्धालुओं को वितरित किया गया। बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण कर भगवान का आशीर्वाद लिया।

स्थानीय लोगों के अनुसार जन्माष्टमी के अवसर पर हर वर्ष इस मंदिर में आसपास के कई गांवों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर का यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ ग्रामीणों के सामूहिक सहभागिता और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।

शनिवार को दिनभर होगा दर्शन-पूजन, शाम को भजन-कीर्तन

जन्मोत्सव के बाद भी मंदिर में धार्मिक कार्यक्रम जारी रहेंगे। शनिवार को दिनभर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना और दर्शन का कार्यक्रम होगा। श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर भगवान के दर्शन करेंगे और विधि-विधान से पूजा-पाठ करेंगे।

शनिवार की संध्या मंदिर परिसर में विशेष भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाएगा। इसमें स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ आसपास के गांवों से आने वाले भक्त भी शामिल होंगे। भजन-कीर्तन के दौरान मंदिर परिसर में एक बार फिर भक्तिमय माहौल देखने को मिलेगा।

रविवार को होगी विसर्जन पूजा, कंधे पर प्रतिमा लेकर गंगा घाट जाएंगे ग्रामीण

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अंतिम चरण में रविवार की सुबह भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना और दर्शन का कार्यक्रम होगा। श्रद्धालु सुबह मंदिर पहुंचकर भगवान के दर्शन करेंगे। इसके बाद विधि-विधान से विसर्जन पूजा की जाएगी।

रविवार की संध्या गोसाईंगांव में प्रतिमा विसर्जन का पारंपरिक आयोजन होगा। ग्रामीण भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को अपने कंधे पर लेकर गंगा घाट तक पहुंचेंगे। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु जुलूस में शामिल होंगे। जय श्रीकृष्ण के जयकारों और भक्तिमय माहौल के बीच प्रतिमा को गंगा घाट ले जाया जाएगा।

गंगा घाट पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। प्रतिमा विसर्जन के साथ ही गोसाईंगांव के प्राचीन श्रीकृष्ण मंदिर में आयोजित जन्माष्टमी महोत्सव का विधिवत समापन होगा।

आस्था और परंपरा का केंद्र बना हुआ है मंदिर

गोसाईंगांव का यह श्रीकृष्ण मंदिर एक सदी से अधिक समय से ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। जन्माष्टमी के अलावा भी विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। मंदिर से जुड़ी पुरानी परंपराओं को ग्रामीण आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार समय के साथ गांव और आसपास के क्षेत्रों में काफी बदलाव आया, लेकिन प्राचीन श्रीकृष्ण मंदिर से जुड़ी आस्था और परंपराएं आज भी कायम हैं। जन्माष्टमी का आयोजन इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर प्रतिमा विसर्जन तक ग्रामीण सामूहिक रूप से आयोजन में भाग लेते हैं।

इस वर्ष भी जन्माष्टमी पर मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ और आधी रात भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय गूंजे जयकारों ने गोसाईंगांव को पूरी तरह कृष्णमय कर दिया। अब शनिवार के दर्शन-पूजन और भजन-कीर्तन के बाद रविवार को पारंपरिक रूप से कंधे पर प्रतिमा लेकर गंगा घाट तक पहुंचने और विसर्जन के साथ इस तीन दिवसीय धार्मिक आयोजन का समापन होगा।

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