


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। नदियों में घटती मछलियों की संख्या के बीच मछुआरा समुदाय की आजीविका को मजबूत करने के लिए सोमवार को मंडपम हॉल, कहलगांव में आधुनिक मत्स्य पालन पर प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। परिधि संस्था ने जल श्रमिक संघ एवं गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े मछुआरों के सहयोग से कार्यशाला का आयोजन किया।
कार्यशाला में जल जीविका के संसाधन व्यक्ति बृजेश एवं वर्तिका प्रिय तथा स्थानीय मत्स्य किसान कुंज बिहारी ने आधुनिक मत्स्य पालन की तकनीकों और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। परिधि के निदेशक उदय ने कहा कि नदियों पर निर्भर मछुआरों की आजीविका लगातार संकट में है। नदियों में मछलियों की संख्या और उपलब्धता घटने के कारण निःशुल्क शिकारमाही का अधिकार मिलने के बावजूद परिवारों की आजीविका सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि परिधि का उद्देश्य मछली पकड़ने वाले लोगों को मछली पालने वाला बनाना है।

वर्तिका प्रिय ने पेन कल्चर और केज कल्चर के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि इन तकनीकों का इस्तेमाल नदी में भी किया जा सकता है। पेन कल्चर में नदी किनारे बांस और जाल के सहारे घेरा बनाकर मछली पालन किया जाता है। नदी से मछलियों को प्राकृतिक भोजन मिलने के कारण इसमें अपेक्षाकृत कम अतिरिक्त चारा देना पड़ता है। वहीं केज कल्चर में तैरते ढांचे के नीचे जाल लगाकर मछलियों के पालन की व्यवस्था की जाती है।
बृजेश ने पानी की गुणवत्ता, घुलित ऑक्सीजन, मिट्टी तथा त्रिस्तरीय मत्स्य पालन सहित उत्पादन बढ़ाने के लिए जरूरी तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी। स्थानीय मत्स्य किसान कुंज बिहारी ने ईंट-भट्ठों से बने गड्ढों को लीज पर लेकर मछली पालन करने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने मत्स्य पालन के लिए उपलब्ध सरकारी सब्सिडी और योजनाओं की जानकारी देते हुए महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।
कार्यक्रम समन्वयक राहुल ने बताया कि सरकारी योजनाओं की जानकारी पहले गांवों में वितरित की गई है। आगे भी इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रहेंगे। इससे पूर्व मक्खातकिया में भी आधुनिक मत्स्य पालन पर कार्यशाला आयोजित की गई थी।
कार्यशाला में सुनील सहनी, शुकदेव सहनी, राजू सहनी, पवन कुमार और रीता देवी ने सवाल-जवाब के माध्यम से अपनी जिज्ञासाएं रखीं। रिंकू देवी, दीपक सहनी, रोहन कुमार, सूरज कुमार और दीपक सहनी ने मत्स्य पालन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।

















