


@ नवगछिया में ग्रामीणों की सूझबूझ का कमाल, बांस के बंडलों से बनाई ठोकर और बचा लिया कटाव प्रभावित इलाका।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। गंगा जब उफनती है तो उसके सामने बड़े-बड़े इंतज़ाम भी कई बार बौने साबित हो जाते हैं। नदी की तेज धार जब किनारों को निगलने के लिए बेताब हो, तब जियो बैग जैसे आधुनिक उपाय भी कई जगह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाते। लेकिन इस बार नवगछिया में ग्रामीणों ने वह कर दिखाया, जिसे देखकर हर कोई उनकी सूझबूझ और हिम्मत की तारीफ कर रहा है।
आधी रात गंगा ने अचानक रौद्र रूप धारण कर लिया। तेज धारा के साथ कटाव ने राघोपुर के बाद नवगछिया के कई इलाकों में दस्तक दी। देखते ही देखते नदी का पानी किनारे को तेजी से काटने लगा। ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल था – रात के अंधेरे में आखिर इस विकराल कटाव को रोका कैसे जाए?
शासन-प्रशासन को सूचना दी गई, लेकिन कटाव स्थल तक मदद पहुंचने में देरी होती रही। इंतजार करने के बजाय ग्रामीणों ने खुद मोर्चा संभाल लिया। न कोई बड़ी मशीन, न कोई अत्याधुनिक तकनीक और न ही कोई भारी-भरकम संसाधन – सहारा बना गांव में आसानी से उपलब्ध बांस और ग्रामीणों का पारंपरिक अनुभव।

ग्रामीणों ने कई बांसों को एक साथ बांधकर मजबूत बंडल तैयार किए। इन बंडलों को कटाव वाले हिस्से में रणनीतिक तरीके से लगाया गया। कहीं बांसों को एक-दूसरे से जोड़ा गया तो कहीं उन्हें नदी की धार के सामने इस तरह स्थापित किया गया कि पानी की सीधी मार को कमजोर किया जा सके। धीरे-धीरे यही देसी जुगाड़ एक तरह की ठोकर का रूप लेने लगा। नदी की तेज धार सीधे मिट्टी के किनारे पर प्रहार करने के बजाय बांस से बने इस अस्थायी अवरोध से टकराने लगी। ग्रामीणों की यह कोशिश रंग लाई और कई कटाव की रफ्तार को काफी हद तक थामने में सफलता मिली।
ग्रामीणों के लिए यह महज कोई प्रयोग नहीं था। उनके सामने घर, खेत, रास्ते और वर्षों की मेहनत को गंगा में समा जाने से बचाने की चुनौती थी। लिहाजा रात के अंधेरे में भी लोग जुटते गए। किसी ने बांस जुटाया, किसी ने बंडल तैयार किए तो किसी ने कटाव स्थल पर उन्हें लगाने में मदद की। यह पूरा अभियान किसी औपचारिक योजना के तहत नहीं, बल्कि जरूरत से पैदा हुई ग्रामीण बुद्धिमत्ता के सहारे आगे बढ़ा।
गांवों में अक्सर ऐसी तकनीकों को महज ‘देसी जुगाड़’ कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन नवगछिया में बांस के बंडलों से बनाई गई ठोकर ने यह दिखा दिया कि स्थानीय परिस्थितियों को समझने वाले ग्रामीण कई बार तत्काल संकट से निपटने का रास्ता खुद खोज लेते हैं।
गंगा के किनारे रहने वाले इन लोगों के लिए नदी का स्वभाव कोई नया नहीं है। वे उसकी धार का मिजाज जानते हैं, कटाव की दिशा पहचानते हैं और यह भी समझते हैं कि पानी की मार को किस तरह कुछ समय के लिए मोड़ा या कमजोर किया जा सकता है।इस बार भी इसी अनुभव ने संकट की घड़ी में रास्ता दिखाया।
बांस से तैयार किए गए इन बंडलों ने न केवल कटाव की रफ्तार को रोकने में मदद की, बल्कि यह संदेश भी दिया कि आपदा के समय स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रात का अंधेरा, सामने उफनती गंगा और तेजी से खिसकता किनारा – हालात डराने वाले थे। लेकिन राघोपुर के ग्रामीण पीछे नहीं हटे।.उन्होंने गंगा की लहरों से मुकाबला करने के लिए किसी बड़ी मशीन का इंतजार नहीं किया। बांस के कुछ बंडल, सामूहिक मेहनत और अपने अनुभव के भरोसे उन्होंने नदी के तांडव के सामने एक अस्थायी दीवार खड़ी कर दी।

















