
वर्ष 1982 में अनुरुद्ध ठाकुर और ग्रामीणों के सहयोग से हुआ था मंदिर का निर्माण, नवमी-दशमी को बलि और भक्ति जागरण की है परंपरा
नवगछिया। शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप माँ कुष्मांडा की आराधना के पावन अवसर पर आइए चलते हैं नवगछिया के रंगरा गाँव, जहाँ माँ जगत जननी का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। राष्ट्रीय राजमार्ग-31 स्थित रंगरा चौक से करीब तीन किलोमीटर दक्षिण रंगरा गाँव के विषहरी स्थान परिसर में माँ दुर्गा का यह मंदिर स्थित है। यहाँ वर्षों से वैदिक विधि-विधान और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ माँ की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से भर जाता है।
ग्रामीणों के सहयोग से वर्ष 1982 में हुआ था मंदिर का निर्माण

रंगरा गाँव स्थित माँ दुर्गा मंदिर का निर्माण वर्ष 1982 में अनुरुद्ध ठाकुर और ग्रामीणों के सहयोग से कराया गया था। मंदिर की स्थापना के बाद से यहाँ दुर्गा पूजा की परंपरा निरंतर चली आ रही है। ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से प्रत्येक वर्ष शारदीय नवरात्र का आयोजन किया जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है।
मंदिर में माँ दुर्गा की आराधना राजसी विधि-विधान और वैदिक परंपरा के अनुसार की जाती है। नवरात्र के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों की विशेष तैयारी होती है। भक्तजन माँ के दरबार में पहुँचकर पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि तथा कल्याण की कामना करते हैं।
माँ के दरबार में मनोकामना लेकर पहुँचते हैं श्रद्धालु
स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच माँ दुर्गा के प्रति गहरी आस्था है। भक्तों का विश्वास है कि माँ जगत जननी अपने दरबार में आने वाले भक्तों की प्रार्थना सुनती हैं। इसी विश्वास के साथ लोग अपनी मनोकामनाएँ लेकर मंदिर पहुँचते हैं और श्रद्धापूर्वक माँ के चरणों में शीश नवाते हैं।

नवरात्र के दौरान मंदिर में पूजा-पाठ का विशेष महत्व रहता है। श्रद्धालु वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होकर माँ की आराधना करते हैं। मंदिर की परंपराओं को ग्रामीण पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे धार्मिक आयोजन के प्रति लोगों की आस्था बनी हुई है।
पंडित शंभूनाथ के वैदिक मंगलाचरण से होती है पूजा
मंदिर में पंडित शंभूनाथ द्वारा वैदिक मंगलाचरण के साथ पाठ किया जाता है। वैदिक मंत्रों के उच्चारण और विधि-विधान के अनुसार होने वाली पूजा-अर्चना से मंदिर का वातावरण आध्यात्मिक बना रहता है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए पहुँचते हैं और पूजा में अपनी सहभागिता निभाते हैं।
मंदिर पूजा समिति के अध्यक्ष गौतम प्रसाद सिंह के अनुसार, यहाँ माँ दुर्गा की पूजा वैदिक परंपरा के अनुसार की जाती है। पूजा के सभी प्रमुख अनुष्ठान धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुरूप संपन्न किए जाते हैं। मंदिर की पूजा-पद्धति और पारंपरिक व्यवस्था इस स्थान को विशिष्ट पहचान देती है।
नवमी और दशमी को बलि की परंपरा
रंगरा गाँव स्थित माँ दुर्गा मंदिर में नवमी और दशमी के अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इन दोनों दिनों में मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं द्वारा सैकड़ों छागरों की बलि दी जाती है। इस दौरान बड़ी संख्या में भक्त माँ के दरबार में पहुँचते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।
नवमी और दशमी मंदिर के वार्षिक धार्मिक आयोजन के प्रमुख दिन माने जाते हैं। इन अवसरों पर मंदिर परिसर में विशेष चहल-पहल रहती है। ग्रामीण और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु पूजा में भाग लेते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों का भी निर्वहन किया जाता है।
नवमी और दशमी की रात होता है भक्ति जागरण
माँ दुर्गा की आराधना के साथ नवमी और दशमी की रात भक्ति जागरण का आयोजन भी किया जाता है। इस दौरान भक्तिमय गीतों और देवी की महिमा के गायन से वातावरण आध्यात्मिक हो उठता है। श्रद्धालु जागरण में शामिल होकर माँ की भक्ति में समय बिताते हैं।
भक्ति जागरण इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पूजा समिति और ग्रामीणों के सहयोग से धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। नवरात्र के इन विशेष अवसरों पर माँ के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह देखने को मिलता है।
एकादशी की सुबह सूर्योदय से पहले होती है प्रतिमा विसर्जन शोभायात्रा
मंदिर पूजा समिति के अध्यक्ष गौतम प्रसाद सिंह के अनुसार, माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन एकादशी की सुबह सूर्योदय से पहले शोभायात्रा के साथ किया जाता है। निर्धारित धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रतिमा विसर्जन का आयोजन संपन्न होता है। नवरात्र के दौरान पूजा से लेकर विसर्जन तक ग्रामीणों की सक्रिय सहभागिता बनी रहती है।
प्रतिमा विसर्जन के साथ दुर्गा पूजा के प्रमुख अनुष्ठान संपन्न होते हैं। इस दौरान श्रद्धालु माँ से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना के साथ विदाई देते हैं।
आस्था और परंपरा को सहेजे हुए है रंगरा गाँव का दुर्गा मंदिर
रंगरा गाँव का माँ दुर्गा मंदिर दशकों से चली आ रही धार्मिक परंपरा और ग्रामीणों की सामूहिक आस्था का प्रतीक है। वर्ष 1982 में ग्रामीणों के सहयोग से निर्मित इस मंदिर में वैदिक विधि से पूजा, पंडित शंभूनाथ का मंगलाचरण, नवमी-दशमी के विशेष अनुष्ठान, बलि की परंपरा और भक्ति जागरण जैसे आयोजन इसे विशिष्ट बनाते हैं।
शारदीय नवरात्र के अवसर पर माँ के दरबार में पहुँचने वाले श्रद्धालु पूरे विश्वास के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। ग्रामीणों के सहयोग से हर वर्ष आयोजित होने वाला यह धार्मिक उत्सव रंगरा गाँव की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।















