
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बदलते दौर में जब त्योहारों के स्वरूप में तेजी से बदलाव आ रहा है, तब भागलपुर के दो ऐतिहासिक दुर्गा पूजा स्थल अपनी सदियों पुरानी परंपराओं के सहारे बंगाली संस्कृति की विरासत को जीवित रखे हुए हैं। बंगाली टोला की आर्य धर्म प्रचारिणी सभा, जिसे हरि सभा या दुर्गाबाड़ी के नाम से जाना जाता है, इस वर्ष सामुदायिक दुर्गा पूजा के 172वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। वहीं, माणिक सरकार स्थित कालीबाड़ी दुर्गा पूजा समिति के मंदिर परिसर में वर्ष 1904 से पारंपरिक रूप में दुर्गा पूजा आयोजित की जा रही है। यहां इस परंपरा के 122 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

इन दोनों पूजा स्थलों की पहचान केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। ये भागलपुर के बंगाली समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों, साहित्यिक विरासत और सामाजिक समरसता के भी महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। प्रख्यात साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, डॉ. बलाई चंद मुखोपाध्याय (बनफूल) और दिव्येंदु पालित जैसे साहित्यिक व्यक्तित्वों से इन स्थलों का जुड़ाव इनके ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाता है।
दुर्गाबाड़ी की परंपराओं में भगवान शिव की प्रतिदिन पूजा का विशेष स्थान है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, वर्ष 1926 में मंदिर भवन के निर्माण के लिए खुदाई के दौरान शिवलिंग मिला था। श्रद्धालुओं ने इसे मां दुर्गा का आशीर्वाद माना और इसके बाद यहां नियमित शिव पूजा की शुरुआत हुई। वर्षों बीतने के बावजूद यह परंपरा आज भी कायम है।दुर्गाबाड़ी की एक अन्य विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। यहां आयोजित होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में विभिन्न समुदायों की भागीदारी देखने को मिलती है। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की ओर से भी पूजा के लिए सहयोग दिया जाता है। इस तरह यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ आपसी सद्भाव का संदेश भी देता है।
पूजा के दौरान पारंपरिक अनुष्ठानों के अलावा नाटक, लघु नाटिकाओं और धुनुची नृत्य जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। धूप से भरे धुनुची पात्रों के साथ किया जाने वाला यह पारंपरिक नृत्य बंगाली दुर्गा पूजा की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है।
दुर्गाबाड़ी से जुड़े निरुपम कांति पाल, उत्तम देबनाथ और जयजीत घोष का कहना है कि उनका उद्देश्य पूजा के पारंपरिक स्वरूप और सदियों पुराने रीति-रिवाजों को सुरक्षित रखना है। उनका मानना है कि बदलते सामाजिक परिवेश में नई पीढ़ी तक इस विरासत को पहुंचाना जरूरी है, ताकि आने वाले समय में भी इन परंपराओं की निरंतरता बनी रहे।
माणिक सरकार स्थित कालीबाड़ी भी भागलपुर के बंगाली समाज की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र है। यहां मां दुर्गा के साथ मां काली और मां लक्ष्मी की पूजा की परंपरा भी चली आ रही है।समिति के अनुसार, पूजा के दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रवींद्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और सुकुमार राय की साहित्यिक रचनाओं को विशेष स्थान दिया जाता है। इन आयोजनों के माध्यम से धार्मिक उत्सव को साहित्य, कला और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जोड़ा जाता है।
यह परंपरा इस बात का उदाहरण है कि त्योहार केवल पूजा-अर्चना का अवसर नहीं होते, बल्कि भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बन सकते हैं।

इन दोनों ऐतिहासिक पूजा स्थलों का आकर्षण भागलपुर तक सीमित नहीं है। पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, बांका, मुंगेर, साहिबगंज और गोड्डा सहित आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
वहीं, भागलपुर से कोलकाता, दुर्गापुर, आसनसोल, मालदा, रायगंज और सिलीगुड़ी जैसे शहरों में जाकर बसे बंगाली परिवारों के कई सदस्य भी दुर्गा पूजा के अवसर पर अपने पुराने शहर लौटते हैं। उनके लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, पारिवारिक स्मृतियों और सामाजिक संबंधों से दोबारा जुड़ने का अवसर है।
दुर्गाबाड़ी के 172 वर्ष और कालीबाड़ी की 122 वर्ष पुरानी पूजा परंपरा भागलपुर के उस सांस्कृतिक इतिहास की गवाही देती है, जिसमें धार्मिक आस्था, साहित्य और सामाजिक समरसता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन आयोजनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विरासत केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं है, बल्कि आज भी लोगों की भागीदारी, पारंपरिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के रूप में जीवंत है। भागलपुर की ये दोनों ऐतिहासिक पूजाएं संदेश देती हैं कि किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों और इतिहास से नहीं बनती, बल्कि उन परंपराओं से भी बनती है, जिन्हें पीढ़ियां मिलकर सहेजती हैं।















