


बीएयू ने शुरू किया ‘एक छात्र-एक किसान-एक समाधान’ कार्यक्रम, छह माह तक खेत में होगा प्रयोग और मूल्यांकन
भागलपुर : कृषि की पढ़ाई अब केवल कक्षा और प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहेगी। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), भागलपुर ने कृषि विद्यार्थियों को सीधे किसानों और उनके खेतों से जोड़कर खेती की वास्तविक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय की ओर से सोमवार को ‘एक छात्र-एक किसान-एक समाधान’ (OSOFOS) फार्म-फील्ड कार्यक्रम की शुरुआत की गई।

छह माह तक चलने वाले इस कार्यक्रम के तहत एक पूरे सेमेस्टर के दौरान प्रत्येक विद्यार्थी को एक किसान के साथ जोड़ा जाएगा। विद्यार्थी किसान के खेत पर जाकर उसकी खेती की प्रमुख समस्या को समझेंगे और उसकी पहचान करेंगे। इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में समस्या की वैज्ञानिक जांच कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक समाधान तैयार किया जाएगा।
कार्यक्रम की शुरुआत बीएयू के कुलपति डॉ. डीआर सिंह ने की। विश्वविद्यालय के अनुसार, यह पहल राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के तहत संचालित रूरल एग्रीकल्चरल वर्क एक्सपीरियंस (RAWE) कार्यक्रम पर आधारित है। इसका उद्देश्य कृषि शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, खेत-केंद्रित और समस्या-समाधान आधारित बनाना है, ताकि विद्यार्थियों को वास्तविक कृषि परिस्थितियों का अनुभव मिले और उनकी सीख का सीधा लाभ किसानों तक पहुंच सके।

398 विद्यार्थी कार्यक्रम से जुड़े, 19 विश्वविद्यालयों की भागीदारी
बीएयू से जुड़े विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्रों के 398 कृषि विद्यार्थी RAWE कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। इनमें 19 विश्वविद्यालयों के 138 विद्यार्थी भी शामिल हैं। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाई जा रही कृषि तकनीकों, अनुभवों और स्थानीय नवाचारों को साझा करने का अवसर मिलेगा।
‘एक छात्र-एक किसान-एक समाधान’ कार्यक्रम के तहत प्रत्येक विद्यार्थी एक किसान के साथ मिलकर उसकी खेती की किसी एक प्रमुख समस्या को चिन्हित करेगा। इसके बाद विद्यार्थी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में समाधान तैयार करने और उसे किसान के खेत में लागू कराने की प्रक्रिया में भी सहयोग करेगा।
किसान केवल लाभार्थी नहीं, ज्ञान के भागीदार होंगे
कुलपति डॉ. डीआर सिंह के अनुसार, कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें किसानों के स्थानीय ज्ञान, पारंपरिक तकनीकों और कम लागत वाले नवाचारों को भी महत्व दिया जाएगा। विद्यार्थियों को किसानों को केवल आधुनिक तकनीक अपनाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान के भागीदार और नवाचारकर्ता के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
किसानों द्वारा अपनाई जा रही उपयोगी कृषि पद्धतियों का दस्तावेजीकरण भी किया जाएगा। इसके बाद कृषि विशेषज्ञों के माध्यम से इन पद्धतियों का तकनीकी सत्यापन कराया जाएगा। सफल और उपयोगी तकनीकों को कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से अन्य किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
खेत की समस्या से समाधान और फिर परिणाम तक होगी निगरानी
कार्यक्रम में केवल समस्या की पहचान कर समाधान सुझाने तक ही प्रक्रिया सीमित नहीं रहेगी। विद्यार्थी किसान के खेत की प्रोफाइल तैयार करने से लेकर समस्या की पहचान, वैज्ञानिक जांच, समाधान तैयार करने, उसे खेत में लागू करने, नियमित निगरानी और उसके प्रभाव का आकलन करने तक की पूरी प्रक्रिया में शामिल रहेंगे।
समाधान कितना प्रभावी रहा, इसका मूल्यांकन भी वैज्ञानिक आधार पर किया जाएगा। इसके लिए उत्पादन में वृद्धि, तकनीक अपनाने की दर, खेती की लागत में कमी, किसान की आय में बदलाव और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग जैसे मानकों को आधार बनाया जाएगा।
सफल प्रयोगों को चिह्नित कर उन्हें दूसरे किसानों के खेतों में भी दोहराने का प्रयास किया जाएगा। इससे एक किसान के खेत में विकसित या आजमाया गया प्रभावी समाधान व्यापक स्तर पर अन्य किसानों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
बीएयू की यह पहल विद्यार्थियों को खेत की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ने के साथ-साथ किसानों की स्थानीय समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने और उनके व्यावहारिक समाधान विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
















