


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। गंगा का रौद्र रूप भले ही अब शांत पड़ गया हो, लेकिन बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहे ग्रामीण इलाकों में मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। कई गांवों में घरों के आसपास और गलियों में अब भी पानी जमा है। जलस्तर में कमी के बावजूद रोजमर्रा की जिंदगी पटरी पर लौटने में वक्त लग रहा है। बाढ़ प्रभावित लोगों के सामने भोजन, पेयजल और आवागमन के साथ-साथ एक ऐसी समस्या भी खड़ी है, जिस पर अक्सर चर्चा कम होती है – शौचालय और स्वच्छता की व्यवस्था। विभिन्न समस्याओं से तो सरकारी इंतजाम कारगर साबित हो रहा है परंतु बाढ़ राहत शिविरों को छोड़कर ग्रामीण इलाके में शौचालय की व्यवस्था में सरकारी प्रयास शून्य है।
पानी से घिरे इलाकों में शौच के लिए सुरक्षित और निजता वाली जगह का अभाव ग्रामीणों, खासकर महिलाओं के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। पुरुष किसी तरह खुले स्थानों या अपेक्षाकृत सूखे हिस्सों में जाकर अपनी जरूरत पूरी कर लेते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए खुले में शौच करना न केवल असुविधाजनक है, बल्कि उनकी निजता और सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर सवाल है।
बांस-बल्ले और पुराने कपड़ों से निकाला रास्ता

इसी परेशानी के बीच बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों ने अपनी जरूरत के मुताबिक स्थानीय संसाधनों से एक अनोखा इंतजाम खड़ा कर लिया। बांस-बल्ले को खड़ा कर और पुराने कपड़ों को पर्दे के रूप में इस्तेमाल कर अस्थायी शौचालय तैयार किया गया है। बाढ़ के पानी और सीमित संसाधनों के बीच ग्रामीणों का यह देसी इंतजाम देखने में भले ही साधारण हो, लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए यह बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।
ऐसे हालात में पुरुष किसी तरह खुले में या दूर-दराज के अपेक्षाकृत सूखे स्थानों पर जाकर शौच कर लेते हैं। लेकिन महिलाओं और किशोरियों के लिए ऐसी व्यवस्था संभव नहीं होती। उन्हें दिन के उजाले में खुले में जाने में सामाजिक संकोच के साथ-साथ सुरक्षा और निजता की चिंता भी रहती है। इसी वजह से ग्रामीणों ने उपलब्ध साधनों से तत्काल समाधान निकालने की कोशिश की है। पुराने कपड़े, बांस और बल्ले से तैयार यह अस्थायी शौचालय फिलहाल महिलाओं के लिए निजता की एक छोटी-सी सुरक्षित जगह बन गया है। ग्रामीणों का य़ह प्रयास बाढ़ के दौरान बुनियादी सुविधाओं की कमी की तस्वीर भी दिखाई देती है। बाढ़ जैसी आपदा के दौरान राहत सामग्री के साथ स्वच्छता और शौचालय की व्यवस्था भी बेहद जरूरी होती है।
लंबे समय तक जलजमाव रहने से खुले में शौच की स्थिति स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा सकती है। दूषित पानी और गंदगी के कारण संक्रमण फैलने की आशंका भी बनी रहती है। ऐसे में अस्थायी शौचालय भले ही तत्काल राहत दे रहा हो, लेकिन बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और टिकाऊ शौचालय की व्यवस्था की जरूरत बनी हुई है।
गंगा का पानी उतरने के साथ उम्मीद है कि हालात धीरे-धीरे सामान्य होंगे। लेकिन जब तक बाढ़ का पानी पूरी तरह नहीं उतरता और सामान्य शौचालयों का इस्तेमाल संभव नहीं होता, तब तक ऐसे अस्थायी इंतजाम ही कई परिवारों के लिए सहारा बने रहेंगे। खासकर महिलाओं के लिए यह बांस-बल्ले और पुराने कपड़ों से बना ढांचा सिर्फ एक शौचालय नहीं, बल्कि बाढ़ के बीच निजता और गरिमा बचाने का ग्रामीण प्रयास है।

















