


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। रेशमनगरी भागलपुर में तसर रेशम उद्योग को नई पहचान दिलाने की दिशा में जिला प्रशासन ने एक महत्वाकांक्षी पहल की है। प्रस्ताव है कि मुंगेर से मिर्जाचौकी तक बनने वाले लगभग 50 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों किनारों पर तसर कीट पालन के लिए उपयुक्त पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाए। यदि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) इस योजना को मंजूरी देता है, तो यह सड़क केवल आवागमन का माध्यम नहीं रहेगी, बल्कि रेशम उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और हरित विकास का नया केंद्र बन सकती है।
जिला प्रशासन ने इस संबंध में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) एनएचएआई को भेजते हुए प्रस्ताव पर शीघ्र स्वीकृति देने का अनुरोध किया है। यह परियोजना सेंट्रल सिल्क बोर्ड, रांची द्वारा तैयार की गई है और इसका उद्देश्य भागलपुर के पारंपरिक तसर उद्योग को मजबूत आधार प्रदान करना है।
सड़क किनारे उगेंगे तसर के पौधे, बढ़ेगा कोकून उत्पादन
योजना के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जिन पर तसर रेशम के कीटों का पालन किया जा सके। इन पौधों के परिपक्व होने के बाद तसर कोकून का उत्पादन बढ़ेगा, जिससे स्थानीय बुनकरों और रेशम उद्योग को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध हो सकेगा। लंबे समय से तसर कोकून की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती रही है, जिसे यह योजना काफी हद तक दूर कर सकती है।

जिला उद्योग केंद्र की महाप्रबंधक खुशबू कुमारी के अनुसार, इस परियोजना से पौधरोपण, पौधों की देखभाल, तसर कीट पालन और कोकून उत्पादन जैसे क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे विकसित होने वाली हरित पट्टी पर्यावरण संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और जैव विविधता को भी मजबूती देगी।
तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी द्वारा जारी पत्र में उल्लेख किया गया है कि यह परियोजना पहले भी एनएचएआई को भेजी गई थी। अब जिला प्रशासन ने पुनः स्मरण पत्र भेजकर जल्द स्वीकृति देने का आग्रह किया है। प्रस्ताव की प्रतिलिपि एनएचएआई के क्षेत्रीय कार्यालय, पटना के अलावा सेंट्रल तसर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, रांची, हस्तकरघा एवं रेशम विभाग तथा उद्योग निदेशालय, बिहार को भी भेजी गई है।
बुनकरों और किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण
रेशम उद्योग से जुड़े भोला प्रसाद का कहना है कि भागलपुर पहले से देश के प्रमुख रेशम केंद्रों में शामिल रहा है। यदि राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बड़े पैमाने पर तसर के पौधे लगाए जाते हैं, तो इससे तसर उत्पादन का स्थायी आधार तैयार होगा। इसका सीधा लाभ किसानों, तसर पालकों और बुनकरों को मिलेगा तथा भागलपुर के रेशम उद्योग को नई गति मिलेगी।
जिला प्रशासन की पहल से रेशम उद्योग से जुड़े लोगों में उम्मीद जगी है। अब सबकी नजरें एनएचएआई की मंजूरी पर टिकी हैं। यदि योजना को हरी झंडी मिलती है, तो आने वाले वर्षों में भागलपुर का यह राष्ट्रीय राजमार्ग केवल यातायात का रास्ता नहीं, बल्कि ‘ग्रीन सिल्क कॉरिडोर’ के रूप में भी पहचान बना सकता है, जो विकास, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा मॉडल साबित होगा।
















