
@ इंसानों के साथ बेजुबान परिंदों पर भी टूटा गंगा के कटाव का कहर। 125 वर्ष पुराने पीपल और विशाल वटवृक्ष गंगा में समाए तो उजड़ गई बगुलों और कबूतरों की दुनिया। दिनभर अपने पुराने बसेरे की तलाश में भटकते हैं परिंदे, रात होते ही गूंज उठता है उनका दर्दभरा क्रंदन।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। गंगा के कटाव ने राघोपुर में इंसानों के साथ बेजुबान परिंदों को भी बेघर कर दिया है। गंगा किनारे खड़े 125 वर्ष पुराने पीपल और विशाल वटवृक्ष पर सैकड़ों बगुलों और कबूतरों का बसेरा था। इन्हीं पेड़ों की डालियों पर उनके घोंसले थे और यही उनका सुरक्षित आशियाना था। लेकिन कटाव की चपेट में आकर दर्जनों पेड़ गंगा की गोद में समा गए। पेड़ों के साथ ही कबूतरों और बगुलों की दुनिया भी उजड़ गई। अब ये परिंदे दिनभर गंगा किनारे आसमान में उड़कर अपना पुराना ठिकाना तलाशते हैं। थक जाने पर कटाव निरोधी कार्य के लिए लगाए गए जियो बैग पर बैठ जाते हैं। रात होते ही उनकी बेचैनी दर्दभरे क्रंदन में बदल जाती है।

दो कबूतरों से शुरू हुआ था कुनबा, अब सैकड़ों में है संख्या:
छोटी अलालपुर निवासी राजकुमार यादव की कबूतरों से जुड़ी कहानी इस त्रासदी को और भी भावुक बना देती है। राजकुमार ने बताया कि उन्होंने कभी महज दो कबूतर पाले थे। धीरे-धीरे उनका कुनबा बढ़ता गया और देखते ही देखते उनकी संख्या सैकड़ों में पहुंच गई। गंगा किनारे 125 वर्ष पुराने पीपल के पेड़ पर इन कबूतरों ने अपना बसेरा बना लिया था। इसके अलावा एक विशाल वटवृक्ष भी उनका ठिकाना था। सुबह होते ही इन परिंदों की चहचहाहट से पूरा गांव गूंज उठता था। राजकुमार की एक पुकार पर कबूतर दौड़े चले आते थे। आज भी उन्हें बुलाने पर वे उनके पास पहुंच जाते हैं। लेकिन अब इस रिश्ते में खुशी के साथ बेबसी भी जुड़ गई है। जिन पेड़ों पर कभी परिंदों की गुटरगूं और चहचहाहट गूंजती थी, वहां अब गंगा की लहरें और कटाव से उजड़ा किनारा दिखाई देता है। पेड़ों के गंगा में समा जाने के बाद भी कबूतर उस जगह को छोड़कर दूर नहीं जा रहे हैं। वे बार-बार उसी इलाके में लौट आते हैं, जहां कभी उनका बसेरा हुआ करता था। मानो वे अब भी अपने पुराने आशियाने को खोज रहे हों।
रात के सन्नाटे में गूंजता है बगुलों और कबूतरों का क्रंदन:
दिनभर की भटकन के बाद रात इन बगुलों और कबूतरों के लिए सुकून लेकर नहीं आती। राजकुमार बताते हैं कि रात के समय परिंदों का क्रंदन सुनाई देता है, जिसे सुनकर उनका मन व्याकुल हो उठता है। जिन परिंदों के लिए कभी रात अपने सुरक्षित बसेरे में लौटने का समय हुआ करती थी, अब उन्हीं के सामने ठहरने और रहने का संकट खड़ा हो गया है।
गंगा किनारे अपने पुराने बसेरे की तलाश में भटकते बगुले और कबूतर प्रकृति की इस त्रासदी का ऐसा मार्मिक चेहरा हैं, जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ बयां कर रहा है। उनके लिए पेड़ों का नष्ट होना केवल आश्रय छिन जाना नहीं, बल्कि उस परिचित दुनिया का उजड़ जाना है, जहां वे सुरक्षित रहते थे। क्या किसी के आशियाने के उजड़ने की पीड़ा सिर्फ इसलिए कम हो जाती है कि वह बेजुबान है?
















