
@ भंवर पहले नींव के नीचे से खिसकती है जमीन, फिर देखते ही देखते जमींदोज हो जाता है मजबूत मकान; ग्रामीणों के अनुभव के पीछे हैं नदी के बहाव और मिट्टी की कमजोरी से जुड़े वैज्ञानिक कारण।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। लौटती गंगा के साथ भंवर यानी ‘कटघुरना’ का कहर लगातार जारी है। शुक्रवार की शाम से शुरू हुए कटाव के बाद रविवार को भी खरीक प्रखंड की पंचायत राघोपुर के छोटी अलालपुर निवासी सच्चिदानंद मंडल और बाल मुकुंद मंडल के पक्के मकान गंगा में समा गया। इससे पहले रेल बांध, ब्रह्म बाबा स्थान, बजरंगबली स्थान और कई घर कटाव की चपेट में आ चुके हैं। करीब 30 घरों पर कटाव का खतरा अब भी मंडरा रहा है। शुक्रवार को पूर्व जिला पार्षद प्रेमशीला देवी, उदय मंडल, पुतुल मंडल, मिथिलेश क्रांति और अनिल मंडल के घर सहित दस लोगों के घर कट चुके हैं। अब शनिवार को भी जारी कटाव ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है।

ग्रामीण गंगा के इस खतरनाक रूप को ‘भंवर’ या स्थानीय भाषा में ‘कटघुरना’ का कहर बताते हैं। राघोपुर निवासी रंजीत मंडल और त्रिलोकी नाथ दिवाकर सहित अन्य ग्रामीणों के अनुसार, पानी के गोल-गोल घूमने के साथ किनारे की मिट्टी तेजी से कटती है। पहले मकान के नीचे की जमीन खोखली होती है, फिर नींव का सहारा खत्म होते ही मजबूत पक्का मकान भी देखते ही देखते ढह जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से नदी में घूर्णी प्रवाह यानी भंवर नदी की मुख्य धारा की दिशा, मोड़, तल की असमान बनावट और पानी की अलग-अलग परतों की गति में अंतर के कारण बन सकता है। तेज बहाव जब किनारे की कमजोर मिट्टी पर दबाव डालता है, तो मिट्टी के कण उखड़कर पानी के साथ बहने लगते हैं। इससे किनारे का निचला हिस्सा कटने लगता है और ऊपर की जमीन का सहारा कमजोर पड़ जाता है।
गंगा के तल में रेत, गाद और मिट्टी की अलग-अलग परतें होती हैं। यदि तेज बहाव कमजोर परतों को काट दे, तो ऊपर की जमीन कुछ समय तक टिकी रहने के बाद अचानक धंस सकती है। यही वजह है कि मजबूत आरसीसी मकान भी कटाव से सुरक्षित नहीं रहते। मकान की मजबूती के साथ नींव के नीचे की जमीन का स्थिर रहना भी जरूरी है।
हालांकि, हर भंवर कटाव का एकमात्र कारण नहीं होता। राघोपुर में इसकी वास्तविक भूमिका जानने के लिए नदी की गहराई, बहाव की गति और दिशा तथा मिट्टी की प्रकृति का तकनीकी अध्ययन जरूरी है। ग्रामीणों का अनुभव है कि गंगा का जलस्तर घटने के दौरान भी कटाव का खतरा बना रहता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण हो सकता है कि बाढ़ के दौरान पानी से संतृप्त हुई मिट्टी के भीतर का दबाव जलस्तर घटने के साथ तुरंत कम नहीं होता। दूसरी ओर, नदी के पानी से मिलने वाला बाहरी सहारा कम हो जाता है। दोनों परिस्थितियां मिलकर कमजोर तट को अस्थिर कर सकती हैं।
इंजीनियरिंग में इसे तेजी से जलस्तर घटने के दौरान तट की अस्थिरता या ‘रैपिड ड्रॉडाउन’ से जुड़ी प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है। हालांकि राघोपुर में इसकी भूमिका की पुष्टि तकनीकी जांच के बाद ही की जा सकती है। नदी के मोड़ पर मुख्य धारा का दबाव बाहरी किनारे की ओर बढ़ने और तल की बनावट बदलने से भी कटाव तेज हो सकता है। गंगा द्वारा रेत और गाद जमा किए जाने से प्रवाह का रास्ता बदल सकता है, लेकिन कटाव की तीव्रता कई कारकों के संयुक्त प्रभाव पर निर्भर करती है।
छोटी अलालपुर और राघोपुर में लगातार कटाव से राघोपुर, शंकरपुर अलालपुर, छोटी अलालपुर गांवों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ गई है।फिलहाल सबसे बड़ी चिंता कटाव की जद में आने वाले करीब 30 घरों की सुरक्षा है।
















