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टीएनबी कॉलेजिएट इंटर विद्यालय के खेल मैदान में प्रस्तावित पार्क निर्माण से जुड़ी सूचना पर विभागीय कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। लेकिन भागलपुर शिक्षा विभाग से जुड़ा एक मामला अब इसी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। एक ही आरटीआई आवेदन पर अलग-अलग कार्यालयों से मिले परस्पर विरोधाभासी जवाबों ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सूचना उपलब्ध होने के बावजूद उसे समय पर नहीं दिया गया या फिर विभागीय समन्वय की कमी के कारण आवेदक को अनावश्यक रूप से कार्यालयों के चक्कर लगवाए गए।

जानकारी के अनुसार दिल्ली निवासी अधिवक्ता आशीष रंजन ने 23 मई 2025 को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन देकर टीएनबी कॉलेजिएट इंटर विद्यालय के खेल मैदान में प्रस्तावित पार्क निर्माण और उसके उपयोग से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी थीं। उन्होंने आवेदन में पूछा था कि विद्यालय के खेल मैदान का उपयोग पार्क के रूप में किस नियम और किस सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से किया जा रहा है। साथ ही यह भी जानना चाहा था कि यदि खेल मैदान के उपयोग में परिवर्तन किया गया है, तो विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक खेल मैदान की क्या व्यवस्था की गई है।

पहले कहा- सूचना हमारे पास नहीं

आरटीआई आवेदन प्राप्त होने के बाद 5 जून 2025 को जिला लोक सूचना शाखा ने आवेदन को यह कहते हुए जिला शिक्षा विभाग को स्थानांतरित कर दिया कि मांगी गई सूचना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। इसके बाद आवेदक को लंबे समय तक कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

फिर कहा- सूचना विद्यालय के पास उपलब्ध है

करीब दो महीने बाद, 4 अगस्त 2025 को शिक्षा विभाग के कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) ने उसी आवेदन को टीएनबी कॉलेजिएट इंटर विद्यालय के लोक सूचना पदाधिकारी के पास भेज दिया। पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि मांगी गई सूचना संबंधित विद्यालय के पास उपलब्ध है और वहीं से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

यहीं से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया। यदि सूचना वास्तव में विद्यालय के पास उपलब्ध थी, तो आवेदन को पहले दूसरे कार्यालय में क्यों भेजा गया? सूचना उपलब्ध होने के बावजूद निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदक को जानकारी क्यों नहीं दी गई? इन सवालों ने विभागीय कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

आरटीआई कानून की समय-सीमा पर भी सवाल

सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में किसी भी आरटीआई आवेदन का जवाब 30 दिनों के भीतर देना अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में आवेदन विभिन्न कार्यालयों के बीच घूमता रहा और सूचना उपलब्ध कराने में काफी विलंब हुआ। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या आरटीआई अधिनियम की निर्धारित समय-सीमा का उल्लंघन हुआ है।

कई सवालों के जवाब अब भी बाकी

इस पूरे मामले ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं—

  • एक ही आरटीआई आवेदन पर अलग-अलग कार्यालयों से अलग-अलग जवाब क्यों दिए गए?
  • यदि मांगी गई सूचना विद्यालय के पास उपलब्ध थी, तो उसे समय पर उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया?
  • क्या सूचना देने में हुई देरी आरटीआई अधिनियम का उल्लंघन है?
  • इस विलंब और विरोधाभासी जवाबों के लिए किस अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?
  • क्या टीएनबी कॉलेजिएट इंटर विद्यालय के खेल मैदान में पार्क निर्माण सभी नियमों एवं सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के अनुरूप किया जा रहा है?
  • यदि खेल मैदान के उपयोग में परिवर्तन किया गया है, तो विद्यार्थियों के खेलकूद के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या की गई है?

पारदर्शिता पर उठे सवाल

यह मामला अब केवल एक आरटीआई आवेदन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी विभागों में पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की भी परीक्षा बन गया है। यदि एक ही मामले में अलग-अलग स्तरों से परस्पर विरोधी जवाब दिए जाते हैं, तो इससे आम नागरिकों का आरटीआई व्यवस्था पर विश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है।

फिलहाल संबंधित विभाग की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। यदि विभाग तथ्यात्मक और स्पष्ट जवाब जारी करता है, तो स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है। तब तक यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता रहेगा।

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