


@ विशेषज्ञों के मुताबिक नमामि गंगे परियोजना और विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य के संरक्षण प्रयासों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कभी गंगा की सेहत का पैमाना मानी जाने वाली गांगेय डॉल्फिन अब भागलपुर-कटिहार के बीच नदी में अपनी मौजूदगी मजबूत करती दिख रही हैं। सुल्तानगंज से मनिहारी के बीच वर्ष 1998 में करीब 95 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। वहीं वर्ष 2018 में हुए सर्वे के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 150 से 180 डॉल्फिन की उपस्थिति पाई गई थी।

27 साल बाद यह संख्या बढ़कर लगभग 215 पहुंच गई है। यानी इस अवधि में गंगा में डॉल्फिन की संख्या में करीब 120 का इजाफा हुआ है।
डॉल्फिन की बढ़ती संख्या को गंगा के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक नमामि गंगे परियोजना और विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य के संरक्षण प्रयासों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सुल्तानगंज से कहलगांव, बटेश्वर स्थान तक गंगा नदी का 55 किमी लंबा क्षेत्र है। 1991 में विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य के रूप में अधिसूचित, यह एशिया में लुप्तप्राय गंगा डॉल्फ़िन के लिए संरक्षित क्षेत्र है। यह अभयारण्य देश में गंगा डॉल्फिन संरक्षण का अहम केंद्र माना जाता है।
डॉल्फिन रिसर्च सेंटर, पटना के डायरेक्टर डॉ गोपाल शर्मा बताते हैं कि वर्ष 2018 में हुए सर्वे के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 150 से 180 डॉल्फिन की उपस्थिति पाई गई थी।
डॉल्फिन बढ़ीं, लेकिन गंगा की चुनौती बरकरार:
डॉल्फिन की संख्या में वृद्धि राहत देने वाली तस्वीर पेश करती है, लेकिन गंगा की सेहत को लेकर खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। कहलगांव से मनिहारी के बीच बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) बढ़ने से पानी में उपलब्ध ऑक्सीजन प्रभावित हो रही है। सीवेज और अन्य अपशिष्ट अब भी नदी प्रदूषण की बड़ी वजह बने हुए हैं।
इसका असर सिर्फ डॉल्फिन तक सीमित नहीं है। गंगा में रहने वाले दूसरे जलीय जीव भी प्रदूषण और पानी की गुणवत्ता में बदलाव से प्रभावित होते हैं।
संरक्षण से आगे अब सफाई की चुनौती:
गंगा किनारे हरित पट्टी विकसित करने और जैविक कृषि को बढ़ावा देने जैसे प्रयासों से रासायनिक प्रदूषकों में कमी आने की बात सामने आई है। लेकिन डॉल्फिन की संख्या बढ़ना संरक्षण की मंजिल नहीं, बल्कि आगे की जिम्मेदारी का संकेत है।
गंगा में डॉल्फिन की वापसी उम्मीद जगाती है, मगर इनकी संख्या को स्थायी रूप से बढ़ाने के लिए नदी को सीवेज और प्रदूषण से बचाना उतना ही जरूरी है।
















