


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर।एक तरफ 17 सितारों से निकली शास्त्रीय सुरों की झंकार, दूसरी ओर मंजूषा की रंग-बिरंगी रेखाओं में जीवित लोककथा और बीच में बिहुला की आस्था, संघर्ष और समर्पण की कहानी। अंग संस्कृति भवन, भागलपुर संग्रहालय परिसर मंगलवार को अंग की लोक-स्मृति और आधुनिक सांस्कृतिक प्रयोगों के अनोखे संगम का गवाह बना।
कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार और जिला प्रशासन, भागलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय बिहुला विषहरी उत्सव का उद्घाटन जिला पदाधिकारी अलंकृता पांडेय ने दीप प्रज्वलित कर किया। शुरुआत राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की प्रस्तुति से हुई।
17 सितारों ने एक साथ छेड़ा सुर:
उत्सव का सबसे अलग आकर्षण बिहार बाल भवन किलकारी, भागलपुर के कलाकारों की सामूहिक वादन प्रस्तुति रही। 17 सितार वादकों समेत 20 वाद्य कलाकारों ने जब एक साथ सुर साधे तो शास्त्रीय संगीत और लोकधुनों का ऐसा मेल बना कि पूरा परिसर संगीत की लय में बंध गया।
सामूहिक सितार वादन ने आयोजन को केवल लोक उत्सव नहीं रहने दिया, बल्कि परंपरा और शास्त्रीय संगीत के संवाद का मंच बना दिया।

गीत में सुनाई दी बिहुला की जिद:
इसके बाद आम्रपाली कला प्रशिक्षण केंद्र के कलाकारों ने गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बिहुला विषहरी की लोकगाथा पर आधारित लोकगीत प्रस्तुत किया। गीत में बिहुला की आस्था, संघर्ष, समर्पण और लोकविश्वास के प्रसंगों को जीवंत किया गया।
दर्शकों के लिए यह सिर्फ एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि अंग की सदियों पुरानी लोकस्मृति से मुलाकात जैसा अनुभव रहा।
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने स्वागत संबोधन में बिहुला विषहरी की लोकगाथा और मनसा पूजा की अंग क्षेत्र में मौजूद सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह लोकगाथा अंग की लोक-स्मृति, आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मंजूषा की ‘हाट’ में कला सीधे खरीदार तक:
उत्सव में आयोजित मंजूषा हटिया और लोक चित्रकला प्रदर्शनी ने कला को मंच से उतारकर सीधे बाजार तक पहुंचाने का काम किया। कलाकारों ने पारंपरिक मंजूषा चित्रकला के साथ आधुनिक विषयों और नए प्रयोगों को भी अपनी कलाकृतियों में जगह दी।
















