


शिक्षक दिवस पर सहयोग ने पेश की अनूठी मिसाल, केदार सिंह और मनोज कुमार झा को अंगवस्त्र व लेखन सामग्री देकर किया सम्मानित
पूर्णिया। शिक्षक दिवस के अवसर पर शनिवार को आकाशवाणी रोड स्थित सहयोग प्रांगण में ऐसे शिक्षकों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने शिक्षा को महज पेशा नहीं बल्कि सेवा और धर्म मानकर आर्थिक लालच से ऊपर उठते हुए वर्षों तक विद्यार्थियों को शिक्षित करने का काम किया। सहयोग की ओर से समाज में शिक्षा की अलख जगाने वाले और झोपड़ी में बच्चों को पढ़ाकर उनके जीवन को संवारने वाले दो गुमनाम शिक्षकों को सम्मानित कर उनके योगदान को सामने लाने का प्रयास किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत सहयोग के अध्यक्ष डॉ. अजीत प्रसाद सिंह ने भारत के द्वितीय राष्ट्रपति एवं महान शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के तैलचित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन करने के साथ की। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने डॉ. राधाकृष्णन के शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में योगदान को याद किया।
कार्यक्रम के दौरान आकाशवाणी रोड, पूर्णिया के श्री केदार सिंह तथा हनुमान बाग, पूर्णिया के श्री मनोज कुमार झा को सहयोग अध्यक्ष डॉ. अजीत प्रसाद सिंह ने अंगवस्त्र और लेखन सामग्री प्रदान कर सम्मानित किया। दोनों शिक्षकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा को अपना दायित्व मानकर लंबे समय तक बच्चों को पढ़ाने का कार्य किया है। झोपड़ी में शिक्षा की शुरुआत कर सैकड़ों विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश पहुंचाने वाले इन शिक्षकों का सम्मान उपस्थित लोगों के लिए प्रेरणादायी रहा।
शिक्षा को धर्म मानकर करते रहे सेवा
सहयोग अध्यक्ष डॉ. अजीत प्रसाद सिंह ने कहा कि समाज में ऐसे अनेक शिक्षक हैं, जो बिना किसी प्रचार और अपेक्षा के अपना पूरा जीवन विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने में लगा देते हैं। आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद बच्चों को पढ़ाना और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना वास्तव में समाज सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल विद्यार्थियों को किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि उनके व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों में अनुशासन, नैतिकता, जिम्मेदारी, सही सोच और अच्छे संस्कार विकसित करता है। यही विद्यार्थी आगे चलकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

डॉ. राधाकृष्णन की स्मृति में मनाया जाता है शिक्षक दिवस
डॉ. अजीत प्रसाद सिंह ने कहा कि शिक्षक दिवस भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाता है। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था। जब उनके विद्यार्थियों और प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने अपना जन्मदिन मनाने के बजाय इसे शिक्षकों के सम्मान के लिए समर्पित करने का अनुरोध किया था। तभी से 5 सितंबर को देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा ज्ञान, संस्कार और अनुशासन पर आधारित रही है। शिक्षक दिवस इसी गौरवशाली परंपरा और शिक्षकों के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करने का अवसर है।
शिक्षक राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव
डॉ. अजीत प्रसाद सिंह ने कहा कि किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। शिक्षक एक सशक्त, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक तैयार करते हैं। इसलिए शिक्षक का सम्मान वास्तव में राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान का सम्मान है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में जहां शिक्षा के क्षेत्र में कई तरह की चुनौतियां हैं, वहीं समाज में ऐसे शिक्षकों को सामने लाना और सम्मानित करना जरूरी है, जो निस्वार्थ भाव से बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। झोपड़ी में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने जिन विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश पहुंचाया, उनके योगदान को किसी पुरस्कार या सम्मान से पूरी तरह मापा नहीं जा सकता। ऐसे शिक्षक समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।
कार्यक्रम में इन सदस्यों का रहा सराहनीय सहयोग
शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में सहयोग के सदस्यों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। कार्यक्रम को सफल बनाने में राजीव कुमार, अनुपम कुमार, राजा कुमार, गौरव, अंश, वैभव, अक्ष, डॉ. केके चौधरी, डॉ. राजेश गोस्वामी, डॉ. सतीश, संजीवनी, डॉ. प्रीतम, आस्था, रंजीत, रमन, रूपेश एवं गांधी का सराहनीय सहयोग रहा।
कार्यक्रम के अंत में सम्मानित शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त किया गया तथा उपस्थित लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को प्रेरणादायी बताते हुए कहा कि समाज में ऐसे गुमनाम शिक्षकों को सम्मान मिलना अन्य लोगों को भी निस्वार्थ भाव से शिक्षा और समाज सेवा के लिए प्रेरित करेगा।
















