


@ प्रदीप विद्रोही
कुछ पत्रकार खबरें लिखते हैं, कुछ इतिहास दर्ज करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी पूरी जिंदगी ही एक जीवंत दस्तावेज़ बन जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा उन्हीं विरले नामों में थे, जिनकी पहचान केवल एक रिपोर्टर या संपादक की नहीं, बल्कि समाज, नदियों और आम आदमी की आवाज़ के रूप में थी।
17 जून 2026 को पटना में उनके निधन के साथ हिंदी पत्रकारिता का एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ, जिसने चार दशकों तक जनपक्षधर पत्रकारिता की मशाल थामे रखी। लेकिन उनकी स्मृतियां और सरोकार आज भी उसी तरह जीवित हैं, जैसे गंगा की अविरल धारा।
पत्रकारिता नहीं, लोकधर्म था उनका जीवन
अमरनाथ झा का पत्रकारिता सफर बिहार की धरती से शुरू हुआ। पाटलिपुत्र टाइम्स में उन्होंने ऐसी रिपोर्टिंग की, जिसमें सत्ता की चमक नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा दिखाई देती थी। वे उन पत्रकारों में थे जो किसी घटना के पीछे छिपे इंसान को खोजते थे।
बाद में वे गुवाहाटी पहुंचे और उत्तरकाल पश्चात पूर्वांचल प्रहरी से जुड़े। पूर्वोत्तर भारत को उन्होंने केवल रिपोर्टिंग का क्षेत्र नहीं माना, बल्कि वहां की संस्कृति, भाषाओं, नदियों और जनजातीय जीवन को गहराई से समझा। कहा जाता है कि जब किसी ने उनसे कहा कि असमिया भाषा जाने बिना रिपोर्टिंग संभव नहीं, तो उन्होंने महज तीन महीने में भाषा सीख ली। यह उनके पेशेवर समर्पण का दुर्लभ उदाहरण था। इसके बाद उनका लंबा कार्यकाल जनसत्ता से जुड़ा, जहां उनकी रिपोर्टिंग और वैचारिक लेखन ने नई पहचान बनाई।

पत्रकारिता के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर एक अलग रास्ता चुना। यह निर्णय आराम की जिंदगी के लिए नहीं था, बल्कि नदी, पानी, जंगल और पर्यावरण की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित करने के लिए था।
उनके लिए गंगा केवल एक नदी नहीं थी, बल्कि करोड़ों लोगों की संस्कृति, आजीविका और सभ्यता की जीवनरेखा थी। गंगा मुक्ति आंदोलन से लेकर पर्यावरण संरक्षण के अभियानों तक वे लगातार सक्रिय रहे। भागलपुर के कहलगांव में आयोजित कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति लगभग तय मानी जाती थी।
श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों ने एक स्वर में कहा कि अमरनाथ झा ने पत्रकारिता को पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व माना।
सभा में वक्ताओं ने याद किया कि उन्होंने अल्फा और बोडो आंदोलन जैसे जटिल विषयों पर गंभीर रिपोर्टिंग की, लेकिन उनका मन हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति और प्रकृति के संरक्षण में लगा रहा।
सबसे भावुक पल
श्रद्धांजलि सभा का सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब उनकी पुत्री ऑनलाइन जुड़ीं। पिता को याद करते हुए उनकी आवाज भर्रा गई। पूरे सभागार में गहरा सन्नाटा छा गया। कई लोगों की आंखें नम थीं।
उस पल लगा कि अमरनाथ झा ने केवल खबरें नहीं लिखीं, बल्कि लोगों के दिलों में स्थायी रिश्ते भी बनाए।
आज जब पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा तात्कालिक सनसनी, टीआरपी और डिजिटल क्लिक की दौड़ में उलझा दिखाई देता है, तब अमरनाथ झा का जीवन एक वैकल्पिक रास्ता दिखाता है। उन्होंने साबित किया कि पत्रकारिता का पहला दायित्व सत्ता नहीं, समाज है; खबर नहीं, मनुष्य है।
उनकी कलम सत्ता से सवाल पूछती थी, लेकिन उसी संवेदनशीलता से नदियों, जंगलों, किसानों और आम नागरिकों की आवाज भी बनती थी।
अमरनाथ झा अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच, उनकी पत्रकारिता और उनका सामाजिक सरोकार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उनकी सच्ची श्रद्धांजलि फूल चढ़ाने में नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और लोकतांत्रिक मूल्यों की उसी निर्भीकता से रक्षा करने में है, जिस साहस के साथ उन्होंने पूरी जिंदगी अपनी कलम चलाई। वे उन दुर्लभ पत्रकारों में थे, जो इतिहास की किताबों में भी दर्ज रहेंगे और लोगों की स्मृतियों में भी। :::
















