
प्रतिमा के बजाय कलश में होती है आराधना, दस दिनों तक अखंड ज्योत और दशहरा पर विशेष अनुष्ठान की है परंपरा
नवगछिया। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा को नमन करते हुए आइए चलते हैं नवगछिया की राजेंद्र कॉलोनी, जहाँ माँ भवानी का एक ऐसा मंदिर है, जिसकी धार्मिक परंपराएँ और इतिहास इसे विशिष्ट पहचान देते हैं। नवगछिया रेलवे स्टेशन के सामने लगभग 300 मीटर की दूरी पर स्थित राजेंद्र कॉलोनी घनी आबादी वाला क्षेत्र है। यहाँ बड़ी संख्या में ऐसे परिवार रहते हैं, जिन्हें कोसी नदी के कटाव के कारण अपना पुराना घर और गाँव छोड़ना पड़ा था। विस्थापन के बाद लोगों ने यहाँ जमीन खरीदकर घर बनाए और स्थायी रूप से बस गए। अपने साथ वे केवल जीवन की यादें ही नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की आस्था और धार्मिक परंपराएँ भी लेकर आए।

कोसी में विलीन हुआ पुराना मंदिर, राजेंद्र कॉलोनी में फिर स्थापित हुई माँ की ज्योत
स्थानीय परंपरा के अनुसार, पुनमा प्रतापनगर में स्थापित माँ भवानी का मंदिर कोसी नदी के कटाव की चपेट में आकर विलीन हो गया था। मंदिर और अपनी आस्था से जुड़े लोगों ने माँ की पवित्र धरा को अपने साथ राजेंद्र कॉलोनी लाने का प्रयास किया। इसके बाद यहाँ माँ भगवती की ज्योत स्थापित की गई। बताया जाता है कि यह स्थापना लगभग दस वर्ष पहले हुई थी।
कोसी के कटाव ने जहाँ लोगों से उनके घर और पुरानी बसावट छीन ली, वहीं माँ भवानी के प्रति उनकी आस्था ने उन्हें अपनी धार्मिक पहचान से जुड़े रहने का संबल दिया। नए स्थान पर मंदिर की स्थापना केवल पूजा-अर्चना की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि अपनी पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का भी प्रयास था। आज राजेंद्र कॉलोनी का यह मंदिर उन्हीं धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का प्रतीक है, जिन्हें विस्थापित परिवारों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद सहेजकर रखा है।
प्रतिमा के बजाय कलश में होती है माँ भवानी की आराधना
राजेंद्र कॉलोनी स्थित माँ भवानी के मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यहाँ नवरात्र के दौरान माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, कलश में माँ भगवती की उपस्थिति मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु इसी कलश और पिंडी के समक्ष शीश नवाते हैं तथा माँ से सुख-शांति और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
मंदिर में नवरात्र के पूरे दस दिनों तक ज्योत जलती रहती है। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ परंपरागत तरीके से संपन्न किए जाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि माँ भवानी अपने दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की प्रार्थना सुनती हैं और उन्हें कष्टों से उबरने का साहस देती हैं। इसी आस्था के साथ लोग नवरात्र के दौरान माँ के दरबार में पहुँचते हैं।

मंदिर में प्रवेश और पूजा की अपनी पारंपरिक व्यवस्था
माँ भवानी के इस मंदिर में प्रवेश और पूजा-अर्चना से संबंधित कुछ विशिष्ट परंपराएँ प्रचलित हैं। स्थानीय जानकारी के अनुसार, मंदिर के गर्भगृह में केवल राजपूत वंश के पुरुषों को पाठ करने के लिए प्रवेश की अनुमति है। अन्य जातियों के लोगों का गर्भगृह में प्रवेश परंपरा के अनुसार वर्जित बताया जाता है।
इसी प्रकार, मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश भी वर्जित है। महिला श्रद्धालु मंदिर के बाहर स्थित बरामदे से ही पूजा-अर्चना करती हैं। इस व्यवस्था का पालन स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार किया जाता है।
इन विशेष नियमों के कारण मंदिर की पूजा-पद्धति आसपास के अन्य देवी मंदिरों से अलग दिखाई देती है। यहाँ की परंपराएँ स्थानीय समुदाय की धार्मिक मान्यताओं और पूर्वजों से चली आ रही व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं।
दशहरा पर बलि की परंपरा, नवमी और दशमी को विशेष आयोजन
राजेंद्र कॉलोनी स्थित माँ भवानी के मंदिर में नवरात्र के दौरान बलि की परंपरा भी प्रचलित है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, दशहरा के अवसर पर नवमी और दशमी को बड़ी संख्या में छागरों की बलि दी जाती है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु माँ के दरबार में पहुँचते हैं और परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।
नवरात्र के दस दिनों तक माँ की पिंडी के समक्ष ज्योत जलती रहती है। मंदिर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और दशहरा के अवसर पर निभाई जाने वाली परंपराएँ स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखती हैं। श्रद्धालु पूरे विश्वास के साथ माँ भवानी की आराधना करते हैं और परिवार तथा समाज के कल्याण की कामना करते हैं।
बड़े मैदान और बेहतर व्यवस्था के लिए भी जाना जाता है मंदिर
मंदिर परिसर में बड़ा मैदान है, जहाँ विभिन्न आयोजनों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध है। स्थानीय स्तर पर यहाँ धार्मिक कार्यक्रमों और सामूहिक आयोजनों की व्यवस्था की जाती है। मंदिर परिसर में उपलब्ध सुविधाएँ और व्यवस्थित आयोजन इसे राजेंद्र कॉलोनी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करते हैं।
नवरात्र के दौरान मंदिर में पूजा-अर्चना का विशेष वातावरण रहता है। स्थानीय परिवार अपने पूर्वजों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार इस महोत्सव में भाग लेते हैं। माँ भवानी के प्रति श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता इस आयोजन को विशेष बनाती है।
विस्थापन के बाद भी नहीं टूटी आस्था की डोर
राजेंद्र कॉलोनी स्थित माँ भवानी का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कोसी नदी के कटाव से प्रभावित परिवारों की स्मृतियों और आस्था से जुड़ा स्थान भी है। जिन लोगों को प्राकृतिक कटाव के कारण अपना पुराना गाँव छोड़ना पड़ा, उन्होंने नए स्थान पर बसने के बाद भी अपनी धार्मिक परंपराओं को नहीं छोड़ा।
पुनमा प्रतापनगर से जुड़ी माँ भवानी की परंपरा को राजेंद्र कॉलोनी में आगे बढ़ाना इस बात का प्रतीक है कि घर और जमीन छूट जाने के बाद भी लोगों की आस्था उनके साथ रहती है। हर वर्ष नवरात्र के दौरान स्थानीय लोग अपने पूर्वजों की परंपराओं का निर्वहन करते हैं और माँ भवानी की आराधना में शामिल होते हैं।
माँ भवानी का यह दरबार अपनी विशिष्ट पूजा-पद्धति, कलश में आराधना, अखंड ज्योत और दशहरा की पारंपरिक मान्यताओं के कारण अलग पहचान रखता है। नवरात्र के पावन अवसर पर यह मंदिर श्रद्धा, परंपरा और विस्थापन के बाद भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की कहानी कहता है।















