


@ 8 साल से प्रमोद को कंधे पर बैठाकर बाबा धाम पहुंचा रहे दीपक, वाराणसी से शुरू हुआ सफर। कांवरिया पथ पर जिसे देख रुक जाते हैं कदम।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कांवरिया पथ पर हजारों कदम बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर बढ़ रहे हैं। कोई नंगे पांव चल रहा है, कोई कांवर उठाए है, कोई बोल-बम के जयघोष में अपनी थकान भूल रहा है। लेकिन इन हजारों श्रद्धालुओं के बीच दो दोस्तों की कहानी ऐसी है, जिसे देखकर राह चलते लोग भी कुछ पल के लिए ठहर जाते हैं।
एक दोस्त के पैर साथ नहीं देते, तो दूसरा उसके पैर बन गया है। एक चल नहीं सकता, तो दूसरा उसे अपने कंधे पर बैठाकर 105 किलोमीटर की यात्रा करा रहा है। यह कहानी है वाराणसी के दीपक कनौजिया और प्रमोद पांडे की।
प्रमोद दिव्यांग हैं और अपने पैरों से चलने में असमर्थ हैं। लेकिन बाबा बैद्यनाथ के दरबार में जल चढ़ाने और महादेव के दर्शन की उनकी इच्छा वर्षों पुरानी है। यह इच्छा उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक संकल्प नहीं, बल्कि दिल की पुकार थी। मगर शरीर की मजबूरी हर बार रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जाती थी। तभी दोस्ती ने उस दीवार को तोड़ने का फैसला किया। दोस्त ने कहा – तुम चल नहीं सकते तो क्या हुआ, मैं तुम्हारे पैर बनूंगा।प्रमोद जब कांवरियों को बाबा धाम की ओर जाते देखते थे, तो उनके मन में भी महादेव के दरबार तक पहुंचने की इच्छा जागती थी। लेकिन वह चल नहीं सकते थे। दीपक ने दोस्त की इस मजबूरी को उसकी कमजोरी नहीं माना।
उन्होंने प्रमोद को अपने कंधे पर उठाया और जैसे यह तय कर लिया कि बाबा के दरबार तक पहुंचने का रास्ता अब दोनों मिलकर तय करेंगे। पिछले आठ वर्षों से दीपक इसी तरह अपने दोस्त की इच्छा पूरी कर रहे हैं। हर साल यात्रा शुरू होती है और दीपक के कंधे पर बैठकर प्रमोद बाबा बैद्यनाथ की ओर बढ़ते हैं। यह सिर्फ कांवर यात्रा नहीं, दोस्ती का वह सफर है जिसमें एक का शरीर थकता है तो दूसरे का हौसला उसे संभालता है।
105 किलोमीटर का सफर कोई आसान यात्रा नहीं है। ऊपर से कंधे पर एक व्यक्ति का भार। कदम-कदम पर शरीर जवाब देने लगता है। कंधों में दर्द होता है, पैरों में थकान उतरती है और कई बार कदम भी लड़खड़ा जाते हैं।
लेकिन दीपक कहते हैं कि जैसे ही मुंह से ‘हर-हर महादेव’ निकलता है, भीतर से फिर ऊर्जा आ जाती है।
उनके लिए दोस्त को कंधे पर उठाना बोझ नहीं, बल्कि दोस्ती और भक्ति का हिस्सा है। दीपक की प्रार्थना भी बेहद सरल है – बाबा भोलेनाथ उनके दोस्त प्रमोद को हमेशा खुश रखें और उनकी दोस्ती इसी तरह बनी रहे।
जिस दोस्त को दीपक कंधे पर उठाकर बाबा के दरबार तक ले जा रहे हैं, उसकी भी अपनी एक प्रार्थना है।
प्रमोद बाबा से अपने लिए कम और दोस्त दीपक के लिए ज्यादा मांगते हैं। वह चाहते हैं कि महादेव दीपक को स्वस्थ रखें और जिंदगी के हर सफर में दोनों का साथ बना रहे।
शायद यही इस दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है – एक को बाबा के दर्शन की इच्छा है और दूसरे की पूरी यात्रा उसी इच्छा को पूरा करने के लिए है।
कांवरिया पथ से गुजरने वाले श्रद्धालु जब दीपक के कंधे पर प्रमोद को देखते हैं तो कुछ पल के लिए उनके कदम थम जाते हैं। कोई दोनों को देखकर भावुक हो जाता है। कोई आगे बढ़कर हौसला देता है। कोई ‘हर-हर महादेव’ का जयकारा लगाता है। कुछ श्रद्धालु इस अनोखी दोस्ती को देखकर अपने साथ चल रहे लोगों से भी इसका जिक्र करते हैं।
भीड़ में दीपक और प्रमोद की जोड़ी अलग दिखाई देती है। एक कंधे पर दोस्त को उठाए आगे बढ़ रहा है और दूसरा उस कंधे पर बैठकर महादेव की ओर जा रहा है।
आस्था के बीच सुविधाओं की कमी भी बनी चुनौती
इस सफर में दोनों दोस्तों को मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता है। दीपक के अनुसार, लंबी दूरी तय करने के बाद मंदिर पहुंचने पर विशेष सुविधाओं की कमी महसूस होती है। दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध कुछ व्यवस्थाओं के शुल्क अधिक होने की बात भी वह बताते हैं। फिर भी इन परेशानियों ने दोनों की आस्था को कमजोर नहीं किया है। क्योंकि इस यात्रा में दीपक के कंधे पर सिर्फ प्रमोद नहीं हैं।
उस कंधे पर आठ साल पुराना भरोसा है, दोस्ती का वादा है और एक दिव्यांग दोस्त की बाबा के दरबार तक पहुंचने की अधूरी इच्छा है और शायद इसलिए कांवरिया पथ पर यह जोड़ी सिर्फ 105 किलोमीटर की दूरी तय नहीं कर रही—यह दोस्ती की उस परिभाषा को भी आगे बढ़ा रही है, जिसमें ‘मैं’ खत्म होकर सिर्फ ‘हम’ बचता है।

















