
@ भागलपुर के सबौर प्रखंड में मेज बनी बिस्तर, ड्यूटी के दौरान नींद लेते दिखे ब्लू और रेड शर्ट वाले कर्मी।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सरकारी दफ्तरों में जनता को काम कराने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, लेकिन भागलपुर के सबौर प्रखंड में कुछ कर्मचारियों ने इंतजार की इस परंपरा को नया आयाम दे दिया है। यहां फाइलों के निपटारे से पहले नींद का निपटारा जरूरी समझा जा रहा है। जनता काम के लिए परेशान हो, तो हो; कर्मचारियों की आराम की घड़ी में खलल नहीं पड़ना चाहिए!
सबौर प्रखंड के कृषि कार्यालय और मनरेगा कार्यालय से सामने आई तस्वीरें कम से कम यही कहानी बयां कर रही हैं। तस्वीरों में एक ओर ब्लू शर्ट पहने किसान सलाहकार मेज पर पसरे नजर आ रहे हैं, तो दूसरी ओर रेड शर्ट पहने कंप्यूटर ऑपरेटर ने भी आराम के मामले में पीछे नहीं रहने का पूरा इंतजाम कर रखा है।
कृषि कार्यालय में ब्लू शर्ट वाले किसान सलाहकार ने कांच की बड़ी मेज को ही अपना आरामगाह बना लिया। सिर के नीचे हाथ का तकिया, मेज पर फैला दूसरा हाथ और पास में रखा मोबाइल—मानो दफ्तर में कामकाज नहीं, बल्कि आराम करने की विशेष कार्यशाला चल रही हो।

उधर, मनरेगा कार्यालय में रेड शर्ट वाले कंप्यूटर ऑपरेटर ने आराम की व्यवस्था को एक कदम आगे बढ़ा दिया। सिर के नीचे बाकायदा कुशन और हाथ में मोबाइल। यानी तकिए से लेकर मनोरंजन तक, सारी सुविधाएं मौजूद! बस कमी थी तो उन लोगों की, जो अपनी समस्या लेकर दफ्तर पहुंचे थे।बताया गया है कि रेड शर्ट पहने ऑपरेटर की तस्वीर दोपहर 2:45 बजे और ब्लू शर्ट पहने किसान सलाहकार की तस्वीर 2:46 बजे ली गई। यानी महज एक मिनट के अंतराल में आराम की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं।
यह वही समय है, जब दूर-दराज के गांवों से किसान कृषि संबंधी सलाह लेने, आवेदन की जानकारी पाने और मनरेगा मजदूर अपनी मजदूरी या भुगतान से जुड़ी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर कार्यालय पहुंचते हैं। लेकिन अगर कर्मचारी ही मेज पर ‘विश्राम मुद्रा’ में मिलें, तो जनता किससे पूछे – ‘साहब, हमारा काम कब होगा?’ शायद जवाब मिले, ‘थोड़ा इंतजार कीजिए, साहब अभी स्लीपिंग मोड में हैं!’
मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि जब जिम्मेदार कर्मचारी ही कार्यालय में सोते नजर आएंगे, तो सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक समय पर कैसे पहुंचेगा? हालांकि, इन तस्वीरों के आधार पर कर्मचारियों की पूरी कार्यशैली या किसी आवेदन में हुई देरी का निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी सामने आना जरूरी है। सबौर के कृषि कार्यालय और मनरेगा कार्यालय में सामने आए इस नजारे पर प्रखंड प्रशासन क्या संज्ञान लेता है? आखिर सरकारी दफ्तर जनता की समस्याएं सुलझाने के लिए हैं या कर्मचारियों की नींद पूरी कराने के लिए?
















