


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन की भीड़ में जहां हजारों कांवरिए बाबा वैद्यनाथ के दर्शन के लिए कदम बढ़ाते हैं, वहीं एक बुजुर्ग डाक बम की यात्रा लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। उम्र भले ही शरीर की रफ्तार पर असर डालती हो, लेकिन आस्था के आगे यहां उम्र भी जैसे ठहर जाती है।

दरभंगा निवासी अपना परिचय कुछ इस तरह इजहार किया है। अपने अंग वस्त्र में महज इतना लिखा है ‘आगे सद्गुरु दया’। ‘डाक बम’ के रूप में साल 1979 से शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है। बाबा जी ने सावन की प्रत्येक सोमवारी को डाक बम यात्रा करने का संकल्प लिया है। कांवर लेकर दौड़ते हुए बाबा वैद्यनाथ धाम पहुंचने वाले बाबा जी अब तक लंबी आस्था यात्रा पूरी कर चुके हैं और 201 डाक यात्रा पूरी करने का संकल्प लिया है।
खास बात यह है कि बाबा जी केवल सामान्य कांवर यात्रा नहीं करते, बल्कि डाक बम के रूप में कांवर लेकर दौड़ते हुए बाबा वैद्यनाथ की नगरी पहुंचते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके संकल्प और हौसले को देखकर रास्ते में चल रहे दूसरे कांवरिए भी भावुक हो जाते हैं।
यात्रा के दौरान जब बाबा जी की रफ्तार थमती है या शरीर साथ देने में थोड़ी मुश्किल होती है, तो राह में मिलने वाले कांवरिए उनके लिए सहारा बन जाते हैं। कोई पानी पिलाता है, कोई कांवर संभालने में मदद करता है तो कोई उन्हें आगे बढ़ने का हौसला देता है। यही सहयोग उन्हें फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ा देता है।
यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, चार दशक से ज्यादा पुरानी आस्था की कहानी है। 1979 में शुरू हुआ संकल्प आज भी बाबा जी के कदमों में दिखाई देता है। सावन की हर सोमवारी उनके लिए एक नई परीक्षा और बाबा वैद्यनाथ के प्रति अटूट विश्वास की नई मिसाल बन जाती है।
रास्ते में मिलने वाले कांवरियों के लिए भी बाबा जी अब किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। उनकी उम्र, तपस्या और संकल्प देखकर लोग खुद आगे बढ़कर उनकी मदद करते हैं और उन्हें बाबा वैद्यनाथ धाम तक पहुंचाने में सहभागी बनते हैं।
जब शरीर थकता है, तो रास्ते के कांवरिए बनते हैं सहारा; जब कदम रुकते हैं, तो आस्था फिर देती है रफ्तार। 201 डाक यात्रा का यह संकल्प अब बाबा जी की पहचान बन चुका है।
















