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प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कुछ मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं होते, वे किसी इलाके की पहचान बन जाते हैं। भागलपुर जिले के सन्हौला का शिव शक्ति मंदिर यानी शिव शक्ति दरबार भी ऐसा ही धार्मिक स्थल है, जहां पांच दशक से अधिक समय से श्रद्धा, परंपरा और सामुदायिक आस्था एक साथ दिखाई देती है। वर्ष 1969 में स्थापित यह मंदिर आज सन्हौला क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता है।


मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी भव्यता नहीं, बल्कि यहां स्थापित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और उनसे जुड़ी स्थानीय आस्था भी है। गर्भगृह में भगवान शिव के शिवलिंग और माता शक्ति की आराधना की जाती है। मंदिर परिसर में भगवान राम, लक्ष्मण और माता जानकी का राम दरबार, राधा-कृष्ण तथा माता दुर्गा की प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।
सफेद रंग की भव्य इमारत, शिखर पर अलग पहचान:
शिव शक्ति दरबार की वास्तुकला भी इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। सफेद रंग की दो मंजिला मंदिर संरचना, ऊपरी हिस्से में बने शिखर और उस पर की गई आकर्षक नक्काशी इसकी भव्यता को उभारती है। लाल-हरे रंग की पत्तियों जैसी सजावटी आकृतियां मंदिर के शिखर को विशिष्ट रूप देती हैं।


प्रवेश द्वार तक पहुंचने वाली लाल और सफेद सीढ़ियां तथा लोहे का आकर्षक गेट मंदिर की बाहरी सुंदरता को और बढ़ाते हैं। सावन और अन्य विशेष अवसरों पर जब मंदिर परिसर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता है तो इसकी छटा देखते ही बनती है।
यहां महाशिवरात्रि सिर्फ पर्व नहीं, सामूहिक उत्सव है
शिव शक्ति दरबार की सबसे बड़ी धार्मिक पहचान महाशिवरात्रि का आयोजन है। स्थापना काल से ही इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ शिव बारात निकाले जाने की परंपरा चली आ रही है।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की बारात और नगर परिक्रमा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ यह आयोजन पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल पैदा करता है। श्रद्धालुओं के लिए शिव बारात केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही सामुदायिक परंपरा का हिस्सा बन चुकी है।
सावन में हर-हर महादेव से गूंजता है परिसर:
सावन का महीना आते ही शिव शक्ति दरबार में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। विशेष रूप से सोमवारी के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करने श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी लोग मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
सुबह से शुरू होने वाली श्रद्धालुओं की आवाजाही देर तक जारी रहती है। बेलपत्र, फूल और जल के साथ भक्त शिवलिंग पर अभिषेक करते हुए भगवान शिव से सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
रात में मंदिर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाए जाने पर इसका स्वरूप और आकर्षक हो जाता है। रोशनी से जगमगाता मंदिर और परिसर में गूंजता ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष सावन की धार्मिक ऊर्जा को और जीवंत कर देता है। कहलगांव से बासुकीनाथ धाम जाने वाले कांवर यात्रा का एक पड़ाव यहां होता ही है।
पांच दशक से अधिक पुरानी आस्था:
1969 में स्थापना के बाद शिव शक्ति दरबार ने सन्हौला की धार्मिक और सामाजिक स्मृतियों में अपनी अलग जगह बनाई है। कई पीढ़ियों से लोग इस मंदिर से जुड़े हैं। यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामुदायिक जुड़ाव का केंद्र है।
शिव शक्ति दरबार की कहानी दरअसल एक ऐसे धार्मिक स्थल की कहानी है, जहां 1969 में जली आस्था की लौ आज भी उसी विश्वास के साथ जल रही है और हर सावन में ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के साथ सन्हौला की धार्मिक पहचान को और मजबूत करती है।

1969 से जल रही आस्था की लौ: सन्हौला का शिव शक्ति दरबार, जहां महाशिवरात्रि पर निकलती है भव्य शिव बारात

प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। कुछ मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं होते, वे किसी इलाके की पहचान बन जाते हैं। भागलपुर जिले के सन्हौला का शिव शक्ति मंदिर यानी शिव शक्ति दरबार भी ऐसा ही धार्मिक स्थल है, जहां पांच दशक से अधिक समय से श्रद्धा, परंपरा और सामुदायिक आस्था एक साथ दिखाई देती है। वर्ष 1969 में स्थापित यह मंदिर आज सन्हौला क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी भव्यता नहीं, बल्कि यहां स्थापित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और उनसे जुड़ी स्थानीय आस्था भी है। गर्भगृह में भगवान शिव के शिवलिंग और माता शक्ति की आराधना की जाती है। मंदिर परिसर में भगवान राम, लक्ष्मण और माता जानकी का राम दरबार, राधा-कृष्ण तथा माता दुर्गा की प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।
सफेद रंग की भव्य इमारत, शिखर पर अलग पहचान:
शिव शक्ति दरबार की वास्तुकला भी इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। सफेद रंग की दो मंजिला मंदिर संरचना, ऊपरी हिस्से में बने शिखर और उस पर की गई आकर्षक नक्काशी इसकी भव्यता को उभारती है। लाल-हरे रंग की पत्तियों जैसी सजावटी आकृतियां मंदिर के शिखर को विशिष्ट रूप देती हैं।
प्रवेश द्वार तक पहुंचने वाली लाल और सफेद सीढ़ियां तथा लोहे का आकर्षक गेट मंदिर की बाहरी सुंदरता को और बढ़ाते हैं। सावन और अन्य विशेष अवसरों पर जब मंदिर परिसर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता है तो इसकी छटा देखते ही बनती है।
यहां महाशिवरात्रि सिर्फ पर्व नहीं, सामूहिक उत्सव है
शिव शक्ति दरबार की सबसे बड़ी धार्मिक पहचान महाशिवरात्रि का आयोजन है। स्थापना काल से ही इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ शिव बारात निकाले जाने की परंपरा चली आ रही है।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की बारात और नगर परिक्रमा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ यह आयोजन पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल पैदा करता है। श्रद्धालुओं के लिए शिव बारात केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही सामुदायिक परंपरा का हिस्सा बन चुकी है।
सावन में हर-हर महादेव से गूंजता है परिसर:
सावन का महीना आते ही शिव शक्ति दरबार में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। विशेष रूप से सोमवारी के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करने श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी लोग मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
सुबह से शुरू होने वाली श्रद्धालुओं की आवाजाही देर तक जारी रहती है। बेलपत्र, फूल और जल के साथ भक्त शिवलिंग पर अभिषेक करते हुए भगवान शिव से सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
रात में मंदिर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाए जाने पर इसका स्वरूप और आकर्षक हो जाता है। रोशनी से जगमगाता मंदिर और परिसर में गूंजता ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष सावन की धार्मिक ऊर्जा को और जीवंत कर देता है। कहलगांव से बासुकीनाथ धाम जाने वाले कांवर यात्रा का एक पड़ाव यहां होता ही है।
पांच दशक से अधिक पुरानी आस्था:
1969 में स्थापना के बाद शिव शक्ति दरबार ने सन्हौला की धार्मिक और सामाजिक स्मृतियों में अपनी अलग जगह बनाई है। कई पीढ़ियों से लोग इस मंदिर से जुड़े हैं। यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामुदायिक जुड़ाव का केंद्र है।
शिव शक्ति दरबार की कहानी दरअसल एक ऐसे धार्मिक स्थल की कहानी है, जहां 1969 में जली आस्था की लौ आज भी उसी विश्वास के साथ जल रही है और हर सावन में ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के साथ सन्हौला की धार्मिक पहचान को और मजबूत करती है।

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