


कृष्णा बम के कदमों में आज भी वही रफ्तार
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। उम्र ने भले ही 74 का आंकड़ा पार कर लिया हो और घुटनों ने कई बार आराम का संकेत दिया हो, लेकिन कृष्णा बम के लिए महादेव की राह में ठहरना अब भी मंजूर नहीं है। सावन आते ही सुलतानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा और बाबाधाम के बीच एक बार फिर उस परिचित नाम की चर्चा शुरू हो गई है, जिसे सुनते ही कांवरिया पथ पर श्रद्धा के साथ उत्साह भी बढ़ जाता है – कृष्णा बम। वे कहती हैं, ‘जब तक सांस, हम भोले के पास।’ इस यात्रा में सैकड़ों डाक बम कृष्णा बम के साथ चल रहे हैं।

मुजफ्फरपुर निवासी कृष्णा बम रविवार को सुल्तानगंज स्थित नामामी गंगा तट पर श्रद्धा की डुबकी लगाई। संकल्प ली और जल पीठ पर बांधकर डाक बम के रूप में बाबा वैद्यनाथ धाम की ओर चल पड़ी।स्वास्थ्य संबंधी कारणों से पिछले वर्षों में उनकी यात्रा में विराम जरूर आया, लेकिन इससे उनकी आस्था की लौ नहीं बुझी।
कृष्णा बम वर्ष 1982 से सुलतानगंज से देवघर की यात्रा करती आ रही हैं। वे कहती हैं, ‘उस समय मैं अभाव में थी। सुलतानगंज आने तक के पैसे नहीं थे। बाबा ने मुझे बुलाया और मैं दौड़ पड़ी। पहली यात्रा के दौरान महज चार डाक बम मेरे साथ चले थे। वर्ष 1983 से 2022 तक उन्होंने डाक बम के रूप में बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक किया। घुटने की समस्या के कारण आगे की यात्रा रुक गई। अब फिर बाबा का बुलावा आया है और मैं निकल पड़ी हूं।’
कृष्णा बम का जीवन केवल कांवर यात्रा तक सीमित नहीं है। वैशाली में जन्मीं और विवाह के बाद मुजफ्फरपुर के चकवासु की रहने वाली कृष्णा बम ने शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 1967 में मैट्रिक पास किया और राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में वह सरकारी शिक्षिका बनीं और वर्ष 2013 में प्रधानाध्यापिका के पद से सेवानिवृत्त हुईं। शिक्षिका से शिवभक्त और फिर देश-विदेश की कठिन धार्मिक यात्राओं की यात्री बनीं कृष्णा बम की कहानी अपने आप में अनूठी है।
4500 किलोमीटर की पैदल यात्रा से कैलाश तक
कृष्णा बम ने वर्ष 1988 में हरिद्वार से देवघर तक करीब एक महीने की पैदल यात्रा की। इसके अगले वर्ष, 1989 में, उन्होंने अपने पुत्र मुकेश कुमार के साथ गंगोत्री से रामेश्वरम तक करीब 4500 किलोमीटर की पैदल यात्रा महज 85 दिनों में पूरी की।
उनकी यात्राओं का सिलसिला यहीं नहीं रुका। वर्ष 2014 में वह कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गईं। वर्ष 2019 में पाकिस्तान स्थित ऐतिहासिक कटासराज शिव मंदिर पहुंचकर भी उन्होंने भगवान शिव का जलाभिषेक किया।
उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण वर्ष 2025 में उन्होंने देवघर की कठिन डाक कांवर यात्रा से विराम लिया था। इसके बजाय उन्होंने मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर से जल उठाकर उज्जैन के महाकालेश्वर तक करीब 130 किलोमीटर की पदयात्रा चार दिनों में पूरी की।
कांवरिया पथ पर उनके लिए सुरक्षा के विशेष इंतजाम भी किए गए हैं। पुलिसकर्मी मानव शृंखला बनाकर उनकी गति और यात्रा को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे हैं। श्रद्धालु दूर से ही उन्हें देखने के लिए रास्ते के किनारे खड़े रहते हैं और ‘बोल बम’ के साथ ‘कृष्णा बम’ के जयकारे भी सुनाई देते हैं।
















