


चार वर्षों से चला रहे अनोखी मुहिम, घर को बनाया गौरैया का सुरक्षित आशियाना
पूर्णिया। कंक्रीट के बढ़ते जंगल, मोबाइल टावरों का बढ़ता रेडिएशन और बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच कभी घर-आंगन में चहचहाने वाली गौरैया अब शहरी क्षेत्रों से धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। ऐसे दौर में पूर्णिया के एक युवा ने बिहार के राजकीय पक्षी गौरैया के संरक्षण की अनूठी मुहिम छेड़कर समाज के सामने प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
गुलाबबाग स्थित श्रीराम कॉलोनी निवासी एवं शोध छात्र शुभम कुमार आज इलाके में ‘स्पैरोमैन’ के नाम से पहचाने जाते हैं। पूर्णिया विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्तमान में बीएन मंडल विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे शुभम पिछले चार वर्षों से गौरैया संरक्षण के अभियान में जुटे हैं। उनके घर में आज 50 से अधिक गौरैया स्थायी रूप से निवास करती हैं, जबकि आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों पक्षी प्रतिदिन यहां आकर आश्रय लेते हैं।
एक कविता ने बदल दी सोच
शुभम बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें पक्षियों से विशेष लगाव रहा है। एक बार उनके पिता उनके लिए बाजार से एक तोता खरीदकर लाए थे। उसी दौरान उन्होंने प्रसिद्ध कविता “हम पक्षी उन्मुक्त गगन के, पिंजरबद्ध न गा पाएंगे…” पढ़ी। कविता की भावनाओं ने उनके मन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने पिंजरे में बंद तोते को आजाद कर दिया।
शुभम कहते हैं कि पक्षी भले इंसानों की भाषा नहीं समझते हों, लेकिन प्रेम और संवेदनाओं को जरूर पहचानते हैं। यही सोच आगे चलकर उनके जीवन का मिशन बन गई।
लॉकडाउन में शुरू हुई गौरैया बचाने की मुहिम
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान जब लोग घरों में सीमित थे, तब शुभम ने अपने आसपास के पर्यावरण और पक्षियों को करीब से देखा। इसी दौरान उन्हें एहसास हुआ कि गौरैया की संख्या तेजी से घट रही है। इसके बाद उन्होंने गौरैया संरक्षण को अपना लक्ष्य बना लिया।
उन्होंने अपने घर को ही पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय में बदल दिया। घर की दीवारों और कोनों में कृत्रिम घोंसले, बर्ड हाउस और मिट्टी के मटके लगाए गए। साथ ही प्रतिदिन दाना-पानी की व्यवस्था शुरू की गई। घर के आसपास हरियाली बढ़ाने के लिए पौधे लगाए गए, जिससे पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो सके।
आज स्थिति यह है कि गौरैया के अलावा मैना और अन्य पक्षी भी यहां अपना बसेरा बनाने लगे हैं। सुबह और शाम घर के आसपास पक्षियों की चहचहाहट से पूरा माहौल जीवंत हो उठता है।
परिवार भी निभा रहा महत्वपूर्ण भूमिका
शुभम की इस पहल में उनके माता-पिता भी बराबर के सहभागी हैं। उनकी मां शीला रानी जायसवाल बताती हैं कि सुबह-सुबह गौरैया की मधुर आवाज सुनना बेहद सुखद अनुभव होता है। वहीं पिता युगल किशोर जायसवाल का कहना है कि गौरैया और अन्य पक्षियों के लिए घर में अनुकूल वातावरण बनाकर उन्हें भी आत्मिक संतोष मिलता है।
उन्होंने बताया कि परिवार प्रतिदिन गौरैया के साथ-साथ अन्य पक्षियों के लिए भी भोजन और पानी की व्यवस्था करता है। उनका मानना है कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता समाज की बड़ी जिम्मेदारी है।
संरक्षण के लिए समाज को आगे आने की जरूरत
बिहार सरकार ने गौरैया को राजकीय पक्षी का दर्जा दिया है, लेकिन इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए जनभागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। शुभम का मानना है कि यदि लोग अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों में पक्षियों के लिए दाना-पानी और सुरक्षित घोंसलों की व्यवस्था करें तो गौरैया की घटती संख्या को रोका जा सकता है।
उन्होंने कहा कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके संरक्षण के लिए समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।
शुभम की यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही है, बल्कि युवा पीढ़ी को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा भी प्रदान कर रही है। आज उनके इस प्रयास की चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है और लोग उन्हें गौरैया संरक्षण का सच्चा प्रहरी मान रहे हैं।













