


प्रदीप विद्रोही
सुल्तानगंज। श्रावणी मेले में हर वर्ष देश के अलग-अलग राज्यों से लाखों शिवभक्त सुल्तानगंज पहुंचते हैं और अपनी-अपनी अनोखी कांवरों से आस्था की मिसाल पेश करते हैं। लेकिन इस बार सुल्तानगंज की पवित्र धरती पर एक ऐसी भव्य कांवर ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जिसे देखते ही श्रद्धालु आश्चर्यचकित रह गए। उज्जैन के महाकालेश्वर की प्रतिमा की तर्ज पर तैयार की गई करीब 300 किलो वजनी ‘महाकाल कांवर’ श्रद्धा, कला और समर्पण का अद्भुत संगम बनकर लोगों के आकर्षण का केंद्र रही।
कोलकाता के काशीपुर से आए शिवभक्तों का यह जत्था सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए रवाना हुआ। जैसे ही यह विशाल कांवर अजगैबीनाथ मंदिर परिसर और कांवरिया पथ पर पहुंची, श्रद्धालुओं की भीड़ इसे देखने के लिए उमड़ पड़ी। कई लोग इस अनोखी कांवर के साथ तस्वीरें और वीडियो बनाते नजर आए।
इस विशाल कांवर की सबसे बड़ी विशेषता इसमें स्थापित 100 लीटर क्षमता का विशाल कलश है, जिसमें गंगाजल भरा गया है। पूरी कांवर को महाकालेश्वर के स्वरूप और शिवभक्ति की झलक देने वाले धार्मिक प्रतीकों से आकर्षक ढंग से सजाया गया है। इसकी भव्यता दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी।
शिवभक्त रघुनाथ राय ने बताया कि इस विशेष कांवर को तैयार करने में करीब तीन महीने का समय लगा। उन्होंने कहा कि वर्षों से मन में ऐसी कांवर बनाने की इच्छा थी, ताकि महाकाल और बाबा बैद्यनाथ के प्रति अपनी आस्था को अनोखे रूप में प्रस्तुत किया जा सके। कई कारीगरों की मेहनत और महीनों की तैयारी के बाद यह भव्य कांवर तैयार हुई। इसे अपने कांधे पर दर्जनों शिव भक्त ने संभाला है।

यात्रा में शामिल झारखंड के भूली निवासी अजय कुमार ने बताया कि वे पिछले आठ वर्षों से लगातार बाबा बैद्यनाथ धाम की कांवर यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाबा की कृपा और अटूट विश्वास ही हर साल उन्हें इस कठिन यात्रा के लिए प्रेरित करता है। इस बार महाकाल कांवर के साथ यात्रा करना उनके लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभव है।
श्रावणी मेले में हर साल श्रद्धालु अपनी आस्था को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन 300 किलो वजनी महाकाल कांवर ने इस बार श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान बना ली है। श्रद्धा, भक्ति, कला और समर्पण का यह अनूठा संगम पूरे कांवर पथ पर चर्चा का विषय बना हुआ है। शिवभक्तों का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल जल अर्पित करना नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति अपनी अटूट भक्ति का संदेश जन-जन तक पहुंचाना भी है।

















