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प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। उम्र करीब 110 साल… शरीर के कई अंग अब पहले की तरह साथ नहीं देते। पैरों ने चलना छोड़ दिया, लेकिन मन आज भी बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक पहुंचने को बेचैन है। पिता ने बस अपनी इच्छा बताई – ‘बाबाधाम जाना है।’ इसके बाद चार बेटों ने ऐसा फैसला लिया, जिसने कांवरिया पथ पर चल रहे लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। मुंगेर के बड़ी चिरैया निवासी अनपी रविदास की इच्छा पूरी करने के लिए उनके चार बेटे – ललन दास, जयराम दास, भोला दास और सीताराम दास – उन्हें कांवर में बैठाकर सुल्तानगंज से देवघर के बाबाधाम की पैदल यात्रा पर निकल पड़े हैं।

पिता पैदल नहीं चल सकते थे, बेटों ने रास्ता अपने कंधों पर उठा लिया:
अनपी रविदास पहले कई बार सुल्तानगंज से देवघर तक पैदल यात्रा कर चुके हैं। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर शरीर ने साथ देना कम कर दिया है। बड़े बेटे ललन दास के मुताबिक, पिता के कई अंग अब ठीक से काम नहीं करते। ऐसे में उनके लिए पैदल कांवर यात्रा करना संभव नहीं था। लेकिन जब पिता ने देवघर जाने की इच्छा जताई तो बेटों ने उन्हें समझाने के बजाय उनकी इच्छा पूरी करने का रास्ता खोजा। करीब पांच दिन पहले अनपी रविदास ने बाबाधाम जाने की इच्छा जाहिर की थी। बेटों ने उसी इच्छा को अपना संकल्प बना लिया।

कांवर में पिता, चारों तरफ बेटों का कंधा:
चारों भाइयों ने अपने 110 वर्षीय पिता को कांवर में बैठाया और सुल्तानगंज से पैदल यात्रा शुरू कर दी। रास्ते में पिता कांवर में बैठे हैं और बेटे बारी-बारी से उन्हें संभालते हुए आगे बढ़ रहे हैं।यह दृश्य सामान्य कांवर यात्रा से बिल्कुल अलग है। जहां हजारों श्रद्धालु अपने कंधे पर गंगाजल लेकर बाबा के दरबार की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं ये चार भाई अपने साथ अपने पिता की इच्छा और आशीर्वाद लेकर चल रहे हैं।

‘श्रवण कुमार’ की कहानी की याद दिलाता दृश्य:
भारतीय लोककथाओं में श्रवण कुमार की कहानी माता-पिता के प्रति समर्पण की मिसाल मानी जाती है। सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा पर निकले इन चार भाइयों को देखकर लोगों को उसी कथा की याद आ रही है।हालांकि यह सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं है। यह उस रिश्ते की तस्वीर भी है, जिसमें कभी पिता ने बच्चों को अपनी गोद और कंधे का सहारा दिया था और आज वही बेटे पिता को अपने कंधों पर लेकर चल रहे हैं।

पिता की इच्छा बनी चारों भाइयों का संकल्प:
भोला दास बताते हैं कि पांच दिन पहले पिता ने देवघर जाने की इच्छा जताई थी। पिता की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए उनके लिए यह यात्रा आसान नहीं थी। लेकिन बेटों ने तय किया कि अगर पिता अपने पैरों से नहीं जा सकते तो उन्हें बेटों के कंधे बाबाधाम तक ले जाएंगे। यात्रा लंबी है, रास्ता कठिन है और मौसम भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके बावजूद चारों भाई कदम-दर-कदम आगे बढ़ रहे हैं।

रास्ते में हर किसी की नजर ठहर जाती है:
कांवर में बैठे बुजुर्ग पिता और उन्हें लेकर चलते चार बेटों का दृश्य जिस किसी ने देखा, उसकी नजर कुछ देर के लिए ठहर गई। कई लोगों ने इसे माता-पिता के प्रति समर्पण की अनोखी मिसाल बताया। यह कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि यहां किसी बड़े आयोजन या दिखावे की जरूरत नहीं पड़ी। एक पिता की छोटी-सी इच्छा थी और चार बेटों ने उसे अपनी जिम्मेदारी मान लिया। 110 साल की उम्र में पिता के कदम भले ही बाबाधाम तक नहीं पहुंच सकते, लेकिन उनके बेटों ने अपने कंधों को ही उनके कदम बना दिया।

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