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प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। जमालपुर लोको शेड में अब लोकोमोटिव के महत्वपूर्ण हिस्सों की जांच के लिए भारी-भरकम प्रक्रिया पर निर्भरता कम होगी। पूर्व रेलवे के मालदा मंडल ने जमालपुर लोको शेड में ‘लाइट स्पीड व्हील रोटेशन टेस्ट बेंच’ तैयार कर उसका शुभारंभ किया है। इस नई तकनीकी व्यवस्था से ट्रैक्शन मोटर और व्हील सेट की जांच अधिक तेजी और सटीकता से की जा सकेगी।


इस सुविधा का उद्घाटन मुख्य विद्युत लोको अभियंता/मुख्यालय, कोलकाता सुमंता दत्ता ने किया। यह पहल मालदा मंडल रेल प्रबंधक मनीष कुमार गुप्ता के मार्गदर्शन में पूरी की गई। मौके पर वरिष्ठ मंडल यांत्रिक अभियंता, जमालपुर श्री कृष्ण कुमार दास सहित रेलवे के अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे।
अब पूरी बोगी उठाने की जरूरत कम:
ट्रैक्शन मोटर की जांच की पारंपरिक प्रक्रिया में कई बार पूरी बोगी को उठाकर मोटर और व्हील सेट को फिट करना पड़ता था। परीक्षण के दौरान खराबी सामने आने पर यही प्रक्रिया दोबारा करनी पड़ती थी। इससे समय और श्रम दोनों अधिक लगते थे।
नई टेस्ट बेंच ने इसी चुनौती का व्यावहारिक समाधान दिया है। अब ट्रैक्शन मोटर और व्हील सेट को सीधे टेस्ट बेंच पर फिट कर परीक्षण किया जा सकेगा, बिना पूरी बोगी को उठाए।
फिटिंग से पहले ही पकड़ में आएगी तकनीकी गड़बड़ी:
नई व्यवस्था में ट्रैक्शन मोटर और व्हील सेट की एसोसिएशन, एलाइनमेंट और रोटेशन से जुड़ी आवश्यकताओं की जांच अधिक सटीक तरीके से की जा सकेगी। इसका फायदा यह होगा कि लोको में फिटिंग से पहले ही संभावित तकनीकी खामियों का पता लगाने में मदद मिलेगी।
इससे बार-बार फिटिंग और रीवर्क की जरूरत घटेगी तथा रखरखाव के दौरान लोको को कम समय में सेवा के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी।
शेड के कर्मचारियों ने खुद तैयार की तकनीक
इस पहल की खास बात यह है कि टेस्ट बेंच को जमालपुर लोको शेड के तकनीकी कर्मचारियों ने इन-हाउस विकसित और तैयार किया है। यानी समस्या का समाधान बाहर से तैयार तकनीक खरीदने के बजाय शेड की अपनी तकनीकी क्षमता और नवाचार के जरिए विकसित किया गया।
इसे रेलवे के ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी तकनीकी नवाचार की भावना से जोड़कर देखा जा रहा है। यह पहल इस बात का उदाहरण भी है कि रेलवे के कार्यशालाओं और लोको शेड में काम करने वाले तकनीकी कर्मचारी रोजमर्रा की परिचालन चुनौतियों के लिए स्थानीय स्तर पर उपयोगी समाधान विकसित कर सकते हैं।
जमालपुर लोको शेड की यह पहल इस मायने में अलग है कि यहां तकनीकी उन्नयन केवल नई मशीनरी लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मैदानी समस्या को समझकर उसका समाधान शेड के भीतर विकसित करने पर जोर दिया गया है। यही पहल आगे चलकर रेलवे के अन्य अनुरक्षण केंद्रों के लिए भी उपयोगी मॉडल बन सकती है।

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