


@ 29 जुलाई से 28 अगस्त तक चल रहा श्री बाबा बटेश्वरनाथ महोत्सव।प्रतिदिन शाम 7 बजे गंगा महाआरती, अखंड संकीर्तन, रुद्राभिषेक और महाप्रसाद बन रहे आकर्षण।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। उत्तरवाहिनी गंगा की पावन धारा के तट पर स्थित सिद्ध श्री बाबा बटेश्वरनाथ धाम इन दिनों भक्ति और आध्यात्मिकता के रंग में सराबोर है। भागलपुर जिले के कहलगांव अनुमंडल में स्थित यह प्राचीन धाम श्रद्धालुओं के बीच ‘गुप्त काशी’ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां मंदिर परिसर में पहुंचते ही एक ओर महादेव की आराधना और दूसरी ओर मां काली की उपासना का अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
मान्यताओं के अनुसार यह स्थान प्राचीन काल से ही तप, साधना और शिव आराधना की भूमि रहा है। उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे इस धाम की धार्मिक महत्ता इसे अन्य शिवस्थलों से अलग पहचान देती है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में यहां महर्षि वशिष्ठ की कठोर तपस्या और भगवान शिव की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

‘जिनके सिर पर है बाबा बटेश्वर नाथ का हाथ, सुख-समृद्धि-आरोग्य सदा है उसके साथ’ – इसी आस्था के साथ भक्त बाबा के दरबार में पहुंच रहे हैं। महोत्सव के आयोजक केंद्रीय रेलवे रेलयात्री संघ के केंद्रीय अध्यक्ष विष्णु खेतान ने श्रद्धालुओं से इस एक माह तक चलने वाले धार्मिक आयोजन में शामिल होने और बाबा बटेश्वर नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने की अपील की है।
सामने महाकाल, दक्षिणमुखी मां काली – अद्भुत धार्मिक संगम:
बाबा बटेश्वर नाथ धाम की सबसे विशेष मान्यताओं में यहां स्थित बाबा बटेश्वर नाथ और दक्षिणमुखी मां कालिका का आमने-सामने विराजमान होना बताया जाता है। श्रद्धालु इसे अत्यंत दुर्लभ आध्यात्मिक संगम मानते हैं। धाम के समीप श्मशान घाट की मौजूदगी भी इसके तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व से जोड़ी जाती है। यही कारण है कि इस स्थल को लंबे समय से साधना और तंत्र उपासना की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
महर्षि वशिष्ठ की तपोभूमि होने की मान्यता:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि वशिष्ठ ने इसी क्षेत्र में हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मान्यता है कि उनकी तपस्या के बाद यहां महादेव की स्थापना हुई। इसी वजह से बाबा बटेश्वर नाथ धाम को साधना, तप और शिव आराधना की सिद्ध भूमि के रूप में देखा जाता है। एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस क्षेत्र में सबसे पहले मां काली का प्राकट्य हुआ था। मां के उग्र स्वरूप के प्रभाव को शांत करने के लिए महर्षि वशिष्ठ ने तपस्या कर महादेव की स्थापना की। बाबा भोलेनाथ की उपस्थिति के बाद मां काली का उग्र रूप शांत हुआ और यह क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन गया।
एक महीने तक चल रहा भव्य बाबा बटेश्वरनाथ महोत्सव:
इसी धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से केंद्रीय रेलवे रेलयात्री संघ की ओर से लगातार 19 वर्षों से यहां श्री बाबा बटेश्वरनाथ महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष महोत्सव का आयोजन बुधवार, 29 जुलाई 2026 से शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 तक किया जा रहा है।
वाराणसी की तर्ज पर गंगा महाआरती:
महोत्सव का सबसे आकर्षक और मनोहारी आयोजन प्रतिदिन होने वाली श्री गंगा महाआरती है। आयोजनकर्ताओं के अनुसार वाराणसी की तर्ज पर प्रतिदिन संध्या 7 बजे गंगा महाआरती का आयोजन किया जा रहा है। संध्या के समय जब उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर आरती की लौ जगमगाती है और वातावरण में मंत्रोच्चार एवं भक्ति गीतों की गूंज सुनाई देती है। बाबा बटेश्वर नाथ धाम में भगवान शिव के रुद्राभिषेक को भी विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।
















