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समर्थगुरुधारा की प्रभावी एवं व्यापक पहल

लेखक : आचार्य अंशु
वरिष्ठ आचार्य, समर्थगुरुधारा
उपाध्यक्ष, इंडियन योग एसोसिएशन, बिहार चैप्टर
निदेशक, टेक्नो स्कूल ऑफ योग

“गौतम ने कहा—हे भिक्षुओ, सुनो,
मन ही सुख-दुःख का मूल अहो,
जो है, उसका करता न मान,
जो नहीं मिला तो है परेशान ”

हजारों वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने मन की प्रकृति को जिस सरलता से समझाया था, आज के समय में उसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन मनुष्य का मन पहले से अधिक तनावग्रस्त दिखाई देता है। प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं, अकेलापन, सोशल मीडिया और तेजी से बदलती जीवनशैली ने मानसिक स्वास्थ्य को हमारे समय की बड़ी चुनौती बना दिया है।

आज यह समस्या केवल किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। छोटे बच्चे पढ़ाई और माता-पिता की अपेक्षाओं के दबाव में हैं। किशोर सोशल मीडिया और साथियों से तुलना से प्रभावित हैं। IIT-JEE, NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी रैंक, परीक्षा और भविष्य को लेकर तनाव में हैं। युवा शिक्षा के बाद रोजगार और करियर की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। नौकरी में कार्यभार, लक्ष्य और प्रतिस्पर्धा का दबाव है, जबकि व्यवसाय में आर्थिक जोखिम और बाजार की अनिश्चितता तनाव पैदा करती है। गृहस्थ जीवन में आर्थिक जिम्मेदारियां, अपेक्षाओं का टकराव और संवाद की कमी रिश्तों को प्रभावित कर रही है। पति-पत्नी के बीच बढ़ती भावनात्मक दूरी कई बार तलाक तक पहुंच जाती है। दूसरी ओर, वृद्धावस्था में अकेलापन, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और परिवार से दूरी मानसिक पीड़ा का कारण बन सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। तनावग्रस्त व्यक्ति चिड़चिड़ा हो सकता है, संवाद से बच सकता है और छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगता है। इसका असर पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, मित्रों तथा कार्यस्थल के संबंधों पर पड़ता है। इस प्रकार व्यक्ति की मानसिक परेशानी धीरे-धीरे परिवार और समाज के वातावरण को भी प्रभावित करने लगती है।

NCRB की Accidental Deaths & Suicides in India रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में 1,71,418 आत्महत्याएं दर्ज हुईं। आत्महत्या के पीछे अनेक सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत कारण होते हैं; इसलिए हर घटना को केवल मानसिक बीमारी से जोड़ना उचित नहीं होगा। फिर भी यह आंकड़ा हमें चेताता है कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की उपेक्षा कितनी गंभीर हो सकती है। प्रत्येक आंकड़े के पीछे एक जीवन, एक परिवार और अनेक अधूरे सपने होते हैं।

आज की Gen Z भी बदलते सामाजिक और मानसिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। युवा शिक्षा, रोजगार, सामाजिक असमानता, शासन और भविष्य जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। दुनिया के अनेक हिस्सों में युवाओं के आंदोलन उनकी जागरूकता और परिवर्तन की आकांक्षा को दर्शाते हैं। सोशल मीडिया ने उनकी आवाज को व्यापक मंच दिया है, लेकिन लगातार तुलना, नकारात्मक समाचार और ऑनलाइन दबाव नई मानसिक चुनौतियां भी पैदा कर रहे हैं। इसलिए युवा ऊर्जा को दबाने के बजाय उसे सकारात्मक दिशा और मानसिक संतुलन देना आवश्यक है।

मानसिक तनाव का असर शरीर पर भी पड़ता है। लंबे समय तक तनाव रहने पर सिरदर्द, थकान, नींद की समस्या, पेट की परेशानी, डायबिटीज, बल्ड प्रेशर और मांसपेशियों में दर्द जैसी वास्तविक शारीरिक समस्याएं उत्पन्न या बढ़ सकती हैं। इन्हें मनोजनित यानी Psychosomatic समस्याओं के संदर्भ में समझा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बीमारी काल्पनिक है। मन और शरीर एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।

उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने National Task Force के गठन की पहल की है। यह महत्वपूर्ण संदेश है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्ति या परिवार की निजी समस्या नहीं, बल्कि संस्थागत और सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

समस्या का समाधान केवल बीमारी होने के बाद उपचार में नहीं, बल्कि समय रहते मानसिक स्वास्थ्य के प्रबंधन में है। इसकी शुरुआत घर से होनी चाहिए। बच्चों से केवल उनके अंक न पूछे जाएं, उनकी भावनाएं भी समझी जाएं। युवाओं को केवल रोजगार की चिंता नहीं, असफलता से निपटने की क्षमता भी दी जाए। पति-पत्नी एक-दूसरे को केवल सुनें नहीं, समझने का प्रयास करें। कार्यस्थलों पर productivity के साथ कर्मचारियों के mental well-being को भी महत्व मिले। वृद्धों को केवल आर्थिक सुरक्षा नहीं, सम्मान, संवाद और अपनापन भी मिले।

पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम, योग-प्राणायाम, ध्यान, संतुलित भोजन, प्रकृति के साथ समय और सोशल मीडिया का संयमित उपयोग मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन गंभीर या लगातार बनी रहने वाली मानसिक परेशानी में मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की विशेषज्ञ सहायता लेने में संकोच नहीं होना चाहिए।

इसी दिशा में समर्थगुरुधारा की प्रभावी और व्यापक पहल देश में चल रही है। उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी के उपचार तक सीमित न रखकर जागरूकता, आत्म-प्रबंधन, योग, ध्यान, सकारात्मक जीवनशैली, संवाद और समय पर सहायता के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना है। शैक्षणिक संस्थानों, कॉरपोरेट, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों तथा अन्य संगठनों में मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन को संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है।

अंततः हमें यह समझना होगा कि IIT की सीट, परीक्षा की रैंक, नौकरी का पैकेज, व्यवसाय का लाभ या सामाजिक प्रतिष्ठा जीवन की पूरी सफलता नहीं है। जीवन स्वयं सबसे बड़ी उपलब्धि है।

गौतम बुद्ध का संदेश आज भी हमें रास्ता दिखाता है—मन को समझिए, अपेक्षाओं को संतुलित कीजिए, जो मिला है उसका मूल्य समझिए और जो नहीं मिला उसके लिए स्वयं को निरंतर पीड़ा में मत रखिए।

क्योंकि स्वस्थ मन से स्वस्थ व्यक्ति बनता है, स्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ परिवार और स्वस्थ परिवारों से ही संवेदनशील, सफल और समरस समाज का निर्माण होता है।

मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन इसलिए केवल आज की जरूरत नहीं—आज की अनिवार्यता है।

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