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@ राघोपुर पंचायत में बाढ़-कटाव ने बदली जिंदगी की तस्वीर।पानी उतरने के इंतजार में ग्रामीण। घर-द्वार डूबे तो सूखे स्थान पर गुजर रही रातें।

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। गंगा के रौद्र रूप पश्चात जिले के 111 गांव एवं 437 वार्ड बाढ़ से प्रभावित हैं तथा लगभग 2,00,102 परिवार प्रभावित हुए हैं। प्रभावित आबादी की संख्या 8,56,379 दर्ज की गई है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से अब तक 24,812 लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। राहत एवं बचाव कार्यों के लिए 122 नावों का परिचालन किया जा रहा है। प्रभावित पशुओं की संख्या 79,390 दर्ज की गई है।प्रभावित क्षेत्रों में 80 स्वास्थ्य केन्द्र सक्रिय हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए जिले में 317 सामुदायिक रसोई संचालित की जा रही हैं। SDRF की टीम भी बचाव कार्य में मुस्तैद है।


जिला प्रशासन के इस प्रयास के बाद भी जिले में बेघर परिवार कम नहीं हैं। गंगा पार की स्थिति अब भी भयावह बनी हुई है। सैकड़ों परिवारो अब भी खानाबदोश की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। मंत्री बुलो मंडल का घर के इलाके में गर्दन भार पानी अब भी मौजूद है। पानी के उतरने में अभी और कितने दिन लगेंगे पता नहीं। बाढ़ का पानी लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ा रहा है। घर-द्वार पानी में डूब चुके हैं। ऐसे में ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिवार को सुरक्षित रखने के साथ-साथ दो वक्त के भोजन का इंतजाम करना है। बाढ़ की विभीषिका के बीच परिवारों में जिम्मेदारियां भी बदल गई हैं। महिलाएं जहां बच्चों की निगरानी में जुटी हैं, वहीं पुरुष परिवार के लिए भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
पीड़ित विजय मंडल बाढ़ की स्थिति और अपनी जिंदगी के बदले हालात को बताते हुए कहते हैं कि घर और दरवाजे अभी तक लबालब पानी में डूबा हुआ है। परिवार के साथ किसी तरह एक सुरक्षित और सूखे स्थान पर रात गुजारनी पड़ रही है। चारों तरफ पानी होने के कारण बच्चों को लेकर हर समय चिंता बनी रहती है।
उन्होंने बताया कि डूबे हुए इलाके में बच्चों के इधर-उधर चले जाने का डर बना रहता है। इसी वजह से उन्होंने अपनी पत्नी को बच्चों की देखभाल और निगरानी की जिम्मेदारी दे दी है। पत्नी लगातार बच्चों को संभालती रहती हैं, ताकि वे खेलते या चलते हुए बाढ़ के पानी की ओर न निकल जाएं। दूसरी ओर, प्रमोद मंडल खुद परिवार के लिए खाना बनाने में जुटे रहते हैं। इन प्रभावित इलाकों में पांच सामुदायिक किचन चल रहे हैं इसके बाद भी पीड़ित परिवार अपने घरों में चूल्हा जला रहे हैं।
भींगे जलावन से चूल्हा जलाना सबसे बड़ी चुनौती:
बाढ़ के दौरान भोजन पकाना भी किसी जंग से कम नहीं है। चारों ओर पानी होने के कारण सूखी लकड़ी या जलावन मिलना मुश्किल हो गया है। जो जलावन उपलब्ध है, वह भी बारिश और बाढ़ के पानी से भीगा हुआ है। ऐसे में चूल्हा जलाना ग्रामीणों के लिए सबसे कठिन काम बन गया है। भींगे जलावन को जलाने के लिए घंटों पंखा झेलना पड़ता है। काफी देर तक कोशिश करने के बाद कहीं जाकर आग सुलगती है। आग जल जाने के बाद भी उसे बुझने से बचाना पड़ता है, ताकि परिवार के लिए भोजन तैयार किया जा सके।
बाढ़ का पानी लोगों के घरों में घुसने के साथ उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को भी पूरी तरह प्रभावित कर चुका है। जहां पहले परिवार के सदस्य अपने-अपने काम में व्यस्त रहते थे, वहीं अब पूरा दिन सुरक्षित ठिकाने की तलाश, बच्चों की निगरानी, भोजन और जरूरी सामान बचाने में बीत रहा है। ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चिंता छोटे बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर है। पानी से घिरे इलाकों में हर कदम पर खतरा बना हुआ है। ऐसे में परिवार एक-दूसरे का सहारा बनकर इस मुश्किल दौर का सामना कर रहे हैं।
जिले की यह तस्वीर बताती है कि बाढ़ सिर्फ घरों और खेतों को ही नहीं डुबोती, बल्कि लोगों की पूरी जीवन-व्यवस्था को बदल देती है। इस आपदा के बीच महिलाएं बच्चों को सुरक्षित रखने में जुटी हैं तो पुरुष किसी तरह चूल्हा जलाकर परिवार का पेट भरने की कोशिश कर रहे हैं। बाढ़ के तांडव के बीच यही छोटे-छोटे संघर्ष प्रभावित परिवारों की जिजीविषा और हिम्मत की कहानी बयां कर रहे हैं।

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