


@ भागलपुर, बांका और मुंगेर में करीब 2099 एकड़ में लगी जीआई टैग वाली कतरनी धान की फसल दस दिनों से बाढ़ के पानी में डूबी है। इस बीच कड़क तेज धूप की भी मार जारी है।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। दूर से देखने पर खेतों में फैला पानी और उसके बीच झलकती हरियाली का दृश्य भले ही बेहद खूबसूरत और मनमोहक नजर आता हो, लेकिन इस तस्वीर के पीछे किसानों की बड़ी चिंता और उनकी महीनों की मेहनत के बर्बाद होने का खतरा भी छिपा रहता है। जलजमाव में भागलपुर की वैश्विक पहचान से जुड़ी जीआई टैग प्राप्त खुशबूदार कतरनी धान की फसल डूबी हुई है। साथ ही कड़क धूप की मार भी बदस्तूर जारी है। पानी के उतरने की संभावना अभी क्षीण है। किसानों के चेहरे मूर्च्छित हो रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार भागलपुर, बांका और मुंगेर जिले के विभिन्न इलाकों में लगभग 2099 एकड़ खेतों में लगी कतरनी धान की फसल पिछले दस दिनों से बाढ़ के पानी में डूबी पड़ी है। लगातार पानी में डूबे रहने के कारण किसानों के सामने फसल के खराब होने की आशंका बढ़ती जा रही है। कतरनी धान सामान्य धान की फसल से अलग अपनी विशिष्ट खुशबू, स्वाद और गुणवत्ता के लिए देश-दुनिया में पहचान रखता है। ऐसे में इस फसल पर आया संकट केवल किसानों की आर्थिक चिंता तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र की कृषि पहचान और कतरनी की विरासत से भी जुड़ा हुआ है।
पानी में डूबी किसानों की महीनों की मेहनत:
किसान अतुल पांडे, विनोद पांडे, सुधांशु सिंह, प्रमोद मंडल, अजय मिश्रा बताते हैं इतने दिनों का जलजमाव धान के फसल को जला देगा। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस हादसे के बाद किसानों को मिलने वाली सहायता राशि भी फर्जी किसान हड़प लेते हैं। किसानों ने कतरनी धान की खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर काफी मेहनत और लागत लगाई है। खेतों में लंबे समय से पानी जमा रहने के कारण पौधों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
किसानों की चिंता इसलिए भी अधिक है क्योंकि कतरनी धान कोई सामान्य फसल नहीं है। इसकी अपनी विशिष्ट पहचान और बाजार में अलग मांग है। भागलपुर और आसपास के इलाके की मिट्टी, जलवायु और पारंपरिक कृषि पद्धतियां कतरनी के उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र की कतरनी धान को जीआई टैग के माध्यम से विशिष्ट पहचान मिली है।
दस दिनों से खेतों में जमा है बाढ़ का पानी:
लगातार दस दिनों से खेतों में पानी जमा रहने से किसानों की परेशानी बढ़ती जा रही है। खेतों से पानी जल्द नहीं निकलने की स्थिति में फसल को नुकसान और बढ़ सकता है। जिन खेतों में कतरनी की फसल लहलहा रही थी, वहां अब पानी का विस्तार दिखाई दे रहा है। कई जगह धान के पौधे पानी में पूरी तरह या काफी हद तक डूबे हुए हैं।
किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि पानी समय रहते नहीं निकला तो उनकी तैयार होती फसल को भारी नुकसान हो सकता है। खेती पर निर्भर परिवारों की आमदनी का बड़ा हिस्सा इस फसल से जुड़ा होता है। ऐसे में फसल खराब होने का सीधा असर उनके घरेलू बजट और अगले कृषि चक्र की तैयारियों पर भी पड़ सकता है।
कतरनी सिर्फ धान नहीं, भागलपुर की पहचान:
भागलपुर की कतरनी धान अपनी विशेष सुगंध और स्वाद के कारण लंबे समय से लोगों के बीच लोकप्रिय रही है। इसकी खुशबू इसे अन्य धान की किस्मों से अलग पहचान देती है। स्थानीय किसान पीढ़ियों से इसकी खेती करते आ रहे हैं। समय के साथ कतरनी को क्षेत्र की कृषि और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माना जाने लगा।
जीआई टैग मिलने के बाद कतरनी की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती मिली। इसके उत्पादन, संरक्षण, प्रसंस्करण और बाजार विस्तार को लेकर लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं। ऐसे में बाढ़ के पानी में कतरनी की बड़ी मात्रा में फसल का डूबना किसानों के साथ-साथ इस विशिष्ट कृषि उत्पाद के संरक्षण के लिहाज से भी चिंता का विषय बन गया है।
किसानों को राहत और फसल बचाने की उम्मीद:
किसानों की नजर अब पानी के तेजी से निकलने और प्रशासनिक स्तर पर मिलने वाली सहायता पर टिकी है। यदि खेतों से जल्द पानी की निकासी हो जाती है तो संभव नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। वहीं, जिन किसानों की फसल को नुकसान पहुंचता है, उन्हें समय पर सर्वे कराकर उचित मुआवजा और कृषि सहायता उपलब्ध कराने की मांग भी उठ सकती है।
फिलहाल खेतों में पसरा पानी बाहर से देखने पर भले ही किसी खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य जैसा प्रतीत हो, लेकिन उसके नीचे किसानों की महीनों की मेहनत, लागत और उम्मीदें डूबी हुई हैं। कतरनी धान के लिए प्रसिद्ध भागलपुर समेत आसपास के इलाकों में यह जलजमाव आने वाले दिनों में किसानों के लिए कितनी बड़ी क्षति लेकर आता है, यह पानी उतरने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगा।















