
कलाभवन साहित्य विभाग की संगोष्ठी में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हुई विस्तृत चर्चा
पूर्णिया। कलाभवन साहित्य विभाग की मासिक संगोष्ठी के अंतर्गत 4 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की स्मृति में साहित्यिक समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. शिवमुनि यादव ने की। मुख्य अतिथि हिंदी विभाग, पूर्णिया विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. कामेश्वर पंकज रहे। विशिष्ट अतिथि एवं वक्ता के रूप में पीजी सेंटर सहरसा के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सिद्धेश्वर कश्यप, डॉ. प्रभात नारायण झा, डॉ. उषा शरण, डॉ. मुकेश कुमार सिंह तथा कलाभवन प्रबंधन परिषद के उपाध्यक्ष विजय कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं राष्ट्रकवि दिनकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। साहित्य विभाग की संयोजिका डॉ. निरुपमा राय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए दिनकर को राष्ट्रीय चेतना का महाकवि बताया। उन्होंने दिनकर की रचनाओं की पंक्तियों के माध्यम से कार्यक्रम की शुरुआत की।

इस अवसर पर भट्ठा मध्य विद्यालय, बांग्ला, पूर्णिया की छात्राओं श्रेया बोस, पीहू कुमारी और लक्ष्मी कुमारी ने दिनकर की कविताओं तथा उनके व्यक्तित्व पर अपने विचार प्रस्तुत किए। साहित्य विभाग की ओर से छात्राओं को डायरी और कलम देकर प्रोत्साहित किया गया।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. शिवमुनि यादव ने दिनकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अपनी रचनाओं के कारण दिनकर आज भी प्रासंगिक हैं। ‘उर्वशी’, ‘रश्मिरथी’ और ‘संस्कृति के चार अध्याय’ जैसी रचनाएं हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
मुख्य अतिथि डॉ. कामेश्वर पंकज ने दिनकर की साहित्यिक दृष्टि और रचनात्मकता पर चर्चा करते हुए कहा कि दिनकर भारतीय साहित्यिक परंपरा के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। उन्होंने दिनकर को अपने समय और परिवेश का कवि बताते हुए उनकी रचनाओं में भारतीय सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और शौर्य की परंपरा के प्रभाव को रेखांकित किया।
उन्होंने ‘मेरे नगपति मेरे विशाल’ और ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ जैसी रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दिनकर की कविताओं में लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक सरोकार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उन्होंने दिनकर की रचनाओं का राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी विश्लेषण किया।
डॉ. सिद्धेश्वर कश्यप ने कहा कि दिनकर की काव्य प्रतिभा बहुआयामी थी। ‘प्रणभंग’, ‘द्वंद्वगीत’, ‘रश्मिरथी’, ‘सामधेनी’ और ‘उर्वशी’ जैसी रचनाओं के कारण दिनकर साहित्य जगत में सदैव स्मरणीय रहेंगे। उन्होंने कहा कि दिनकर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में युवाओं में ऊर्जा और राष्ट्रभावना जगाने का कार्य किया। उनकी रचनाओं में कर्म, संघर्ष, शांति, सहयोग, सम्मान और समभाव जैसे मूल्यों का समन्वय दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद को साहित्यिक अभिव्यक्ति देने वाले प्रमुख कवियों में दिनकर का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं में सामाजिक समरसता और ‘जियो और जीने दो’ की भावना दिखाई देती है। उन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति की चेतना को मजबूत किया।
कलाभवन प्रबंधन परिषद के उपाध्यक्ष विजय कुमार श्रीवास्तव ने ‘रश्मिरथी’ और कर्ण के चरित्र पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि ‘रश्मिरथी’ के कारण दिनकर का नाम पूर्णिया से भी विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।

डॉ. प्रभात नारायण झा ने कहा कि केवल दिनकर की पंक्तियों को नारे के रूप में दोहराने से उनके साहित्य को समझा नहीं जा सकता। यह समझना आवश्यक है कि दिनकर की रचनाओं का मूल भाव क्या है। उन्होंने कहा कि ओज, उत्साह, उल्लास और तेज के कवि दिनकर को पढ़ना आत्मचिंतन और आत्मबल को मजबूत करने की प्रक्रिया है। उन्होंने युवाओं में ऊर्जा और राष्ट्रीय चेतना बनाए रखने के लिए दिनकर की रचनाओं के अध्ययन को आवश्यक बताया।
डॉ. मुकेश कुमार सिन्हा ने ‘रश्मिरथी’ में वर्णित कर्ण के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने दिनकर की विभिन्न पंक्तियों का उदाहरण देते हुए ‘रश्मिरथी’ को विशिष्ट कृति और कर्ण को साहित्य का प्रभावशाली पात्र बताया।
साहित्य विभाग के वरिष्ठ सदस्य डॉ. केके चौधरी ने कहा कि दिनकर ने जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा की दीवारों से ऊपर उठकर साहित्य की रचना की। उन्होंने कहा कि दिनकर की रचनाओं में स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ने और सामाजिक समरसता स्थापित करने का संदेश मिलता है।
महेश विद्रोही ने दिनकर के गांव सिमरिया से अपने जुड़ाव का उल्लेख करते हुए उनके साहित्य में प्रकृति और नारी के प्रति दृष्टिकोण पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि गरीब और सर्वहारा वर्ग की समस्याओं को स्वर देने वाले दिनकर वास्तव में राष्ट्रकवि के रूप में स्थापित हुए।
डॉ. उषा शरण ने दिनकर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। वहीं डॉ. निशा प्रकाश और वंदना कुमारी सहित अन्य प्रतिभागियों ने दिनकर की कविताओं का पाठ किया।
कार्यक्रम में अर्चना कुमारी, डॉ. छाया जोशी, अखिलेश चंद्रा, विमल कुमार, विनायक रंजन, सुनील समदर्शी, अनिल कुमार पंकज, महेश विद्रोही, सोनू कुमार राय, प्राचार्य रामदेव दास, अनिकेत कुमार सिंह, मनोज कुमार राय, मुकेश कुमार, छोटू घोष सहित साहित्य एवं कला जगत से जुड़े कई लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में साहित्य विभाग की संयोजिका डॉ. निरुपमा राय ने धन्यवाद ज्ञापन किया।















