
1862 में हुआ था मंदिर का निर्माण, एक ही पिंडी पर विराजती हैं मां दुर्गा सहित सात देवियां; नवरात्र में मनोकामना लेकर दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
विशेष नवरात्र आलेख: बरुण बाबुल
नवगछिया। शारदीय नवरात्र का आगमन होते ही चारों ओर मां दुर्गा की आराधना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहीं भव्य पूजा पंडाल सजाए जाते हैं, कहीं मां की आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित होती हैं, तो कहीं ढोल-नगाड़ों और मंत्रोच्चार के बीच देवी की उपासना की जाती है। लेकिन नवगछिया क्षेत्र में एक ऐसा प्राचीन भगवती स्थान भी है, जहां नवरात्र की आस्था का स्वरूप इन सबसे अलग है। यहां न भव्य सजावट की अनिवार्यता है, न मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा, न ढोल-नगाड़ों का शोर और न ही बलि प्रथा। इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता है—सादगी, परंपरा और मां भगवती के प्रति अटूट श्रद्धा।

यह पावन स्थल भागलपुर जिले के नवगछिया क्षेत्र में गोपालपुर-सैदपुर मार्ग पर स्थित नवटोलिया गांव में है। स्थानीय लोग इसे श्रद्धापूर्वक ‘भगवती थान’ के नाम से पुकारते हैं। गांव के चौक से लगभग 40 कदम की दूरी पर स्थित यह मंदिर वर्षों से ग्रामीणों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्र के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। विशेष रूप से वे भक्त यहां दर्शन करने पहुंचते हैं, जिनकी मनोकामना पूरी हुई होती है और जो मां के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करना चाहते हैं।
एक पिंडी पर विराजती हैं सात देवियां
इस भगवती स्थान की सबसे अनूठी विशेषता यहां एक ही पिंडी पर सात देवियों का विराजमान होना है। यहां मां दुर्गा, मां काली, मां शीतला, मां विषहरी, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां संतोषी की आराधना एक साथ की जाती है।
देवी के इन विभिन्न स्वरूपों के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का विषय हैं। कोई मां दुर्गा से शक्ति और साहस की कामना करता है, तो कोई मां लक्ष्मी से सुख-समृद्धि तथा मां सरस्वती से ज्ञान और विवेक का आशीर्वाद मांगता है। मां काली, मां शीतला, मां विषहरी और मां संतोषी के प्रति भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है।

एक ही स्थान पर देवी के सात स्वरूपों की उपस्थिति इस मंदिर को विशिष्ट पहचान देती है। यहां आने वाले भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं और मां के चरणों में सुख, शांति, समृद्धि तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
वर्ष 1862 से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
नवटोलिया के इस भगवती स्थान का इतिहास लगभग डेढ़ शताब्दी से भी अधिक पुराना है। उपलब्ध स्थानीय विवरण के अनुसार, वर्ष 1862 में मंदिर के निर्माण के लिए भूमि दान की गई थी। मंदिर का निर्माण स्वर्गीय जगदीश झा, स्वर्गीय जनार्दन झा तथा ग्रामीणों के सहयोग से कराया गया था।
उस समय से ही यह स्थान ग्रामीण समाज की धार्मिक आस्था और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक बना हुआ है। गांव के लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस धार्मिक परंपरा को संजोकर रखा है। समय बदलता रहा, पूजा-पद्धतियों में बदलाव आया और आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक आयोजनों का स्वरूप भी विस्तृत हुआ, लेकिन इस भगवती स्थान की मूल पहचान सादगी और श्रद्धा पर आधारित रही।
वर्ष 2004 में मंदिर का नए स्वरूप में जीर्णोद्धार कराया गया। इसके बाद मंदिर की व्यवस्था और स्वरूप को बेहतर बनाने के साथ इसकी धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाया गया। आज भी यह स्थान स्थानीय लोगों के लिए केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों की आस्था से जुड़ी धरोहर है।
यहां आडंबर नहीं, श्रद्धा का है महत्व
आज के दौर में धार्मिक आयोजनों के साथ भव्य सजावट, आकर्षक विद्युत प्रकाश, विशाल पंडाल और ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रचलन बढ़ा है। ऐसे समय में नवटोलिया का यह भगवती स्थान अपनी अलग परंपरा के कारण ध्यान आकर्षित करता है।
यहां मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने के बजाय स्थापित पिंडी की पूजा की जाती है। नवरात्र के दौरान यहां जयंती और पाठ की परंपरा का विशेष महत्व है। पूजा का स्वरूप सहज और पारंपरिक है। यहां देवी की आराधना के लिए बाहरी आडंबर को आवश्यक नहीं माना जाता। श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ मंदिर पहुंचते हैं, मां के दर्शन करते हैं और पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं।
इस मंदिर की विशेषता केवल पूजा की सादगी नहीं, बल्कि वह भाव भी है जो लोगों को अपनी परंपरा से जोड़े रखता है। यहां की धार्मिक मान्यता ग्रामीण जीवन, पारिवारिक संस्कार और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था के साथ जुड़ी हुई है।
नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
शारदीय नवरात्र के दौरान इस भगवती स्थान पर गांव और आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं का आना-जाना बढ़ जाता है। मां के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन करने और पूजा-अर्चना करने के लिए लोग यहां पहुंचते हैं। विशेष रूप से मनोकामना पूर्ण होने के बाद मां के दर्शन करने आने वाले भक्तों की यहां आस्था देखने को मिलती है।
ग्रामीणों के लिए यह मंदिर सामूहिक आस्था का केंद्र है। यहां पूजा के अवसर पर लोगों का एकत्र होना सामाजिक जुड़ाव और आपसी सहयोग की भावना को भी मजबूत करता है। मंदिर से जुड़ी परंपराएं नई पीढ़ी को अपने धार्मिक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का माध्यम भी हैं।
नवरात्र के प्रथम दिन जब देशभर में मां शैलपुत्री की पूजा के साथ शक्ति की आराधना आरंभ होती है, तब नवटोलिया के इस भगवती स्थान की विशेष परंपरा भी स्मरण दिलाती है कि देवी की उपासना के अनेक रूप हो सकते हैं। कहीं भव्य आयोजन श्रद्धा का माध्यम बनते हैं, तो कहीं एक प्राचीन पिंडी के सामने की गई शांत प्रार्थना ही पूजा का आधार होती है।
परंपरा को संजोए हुए है नवटोलिया का भगवती स्थान
मंदिर के व्यवस्थापक शिक्षक विजय झा का घर मंदिर से लगभग दस कदम की दूरी पर स्थित है। उनके पूर्वजों की ओर से मंदिर के लिए भूमि दान और ग्रामीणों के सहयोग से हुए निर्माण की परंपरा इस स्थान के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर की व्यवस्था से जुड़े लोग और ग्रामीण आज भी इस धार्मिक धरोहर को सहेजने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
नवटोलिया का यह भगवती स्थान हमें बताता है कि किसी धार्मिक स्थल की पहचान केवल उसकी भव्यता से नहीं होती। उसकी असली पहचान उस परंपरा, विश्वास और सामूहिक भावना में होती है, जिसे लोग वर्षों तक अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखते हैं।
वर्ष 1862 से जुड़ा इतिहास, एक ही पिंडी पर विराजमान सात देवियों की आराधना और बिना आडंबर के पूजा की परंपरा इस मंदिर को नवगछिया क्षेत्र की विशिष्ट धार्मिक धरोहर बनाती है। शारदीय नवरात्र के अवसर पर यह भगवती स्थान श्रद्धालुओं को आस्था के उस सहज स्वरूप की याद दिलाता है, जहां पूजा का मूल आधार दिखावा नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और मां के प्रति अटूट विश्वास है।
नवगछिया के नवटोलिया गांव का यह प्राचीन भगवती स्थान आस्था, सादगी और परंपरा की ऐसी कहानी कहता है, जो समय के साथ भी अपनी पहचान बनाए हुए है।














