
कोसी नदी से निकले पत्थर को माता का स्वरूप मानकर ग्रामीणों ने शुरू की थी पूजा-अर्चना, आज भी लोगों की अटूट आस्था
नवगछिया के खरीक प्रखंड के भवनपुरा गांव में मां दुर्गा जलेश्वरी माता के रूप में पूजी जाती हैं। माता के इस मंदिर से जुड़ी करीब 200 साल पुरानी कहानी आज भी गांव के लोगों के बीच प्रचलित है। मंदिर में मां का प्रतीक स्वरूप एक पत्थर स्थापित है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि माता का स्वरूप है। ग्रामीणों के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि इस पत्थर के आकार में लगातार वृद्धि हो रही है।

गांव के बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर में स्थापित माता का यह स्वरूप कोसी नदी से निकला था। बाद में ग्रामीणों ने इस पत्थर को मां दुर्गा का प्रतीक मानकर स्थापित किया और पूजा-अर्चना शुरू कर दी। माता को जलेश्वरी नाम से पुकारा जाने लगा। इसी नाम से उनकी पहचान भवनपुरा और आसपास के इलाकों में बनी हुई है।
मछुआरे के जाल में बार-बार फंसता था पत्थर
जलेश्वरी माता के नामकरण के पीछे एक पुरानी लोककथा प्रचलित है। गांव के बुजुर्गों के मुताबिक, करीब 200 साल पहले एक मछुआरा तालाब में मछली पकड़ने के लिए जाल डालता था। कुछ दिनों से उसके जाल में मछलियों की जगह हर दिन एक पत्थर फंस जाता था। मछुआरा जब जाल बाहर निकालता तो उसमें पत्थर देखकर निराश हो जाता था।

मछुआरा अपनी किस्मत को कोसते हुए उस पत्थर को हर दिन तालाब में ही फेंक देता था। उसे समझ में नहीं आता था कि मछली पकड़ने के दौरान बार-बार वही पत्थर उसके जाल में कैसे आ रहा है। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। मछुआरे के लिए यह रोज की परेशानी बन गई थी।
लोककथा के अनुसार, एक रात मां दुर्गा ने मछुआरे को सपने में दर्शन दिए। माता ने उसे बताया कि उसके जाल में फंसने वाला पत्थर उनका ही प्रतीक है। इसके बाद मछुआरे को पत्थर के महत्व का एहसास हुआ।
ग्रामीणों ने पत्थर को माता का स्वरूप मानकर की पूजा
अगली सुबह मछुआरे ने गांव के लोगों को सपने में मिली जानकारी बताई। उसकी बात सुनकर ग्रामीण उसके साथ तालाब पर पहुंचे। इसके बाद मछुआरे ने एक बार फिर तालाब में जाल डाला। मान्यता के अनुसार, उस दिन भी जाल में वही पत्थर निकला, जो पहले कई दिनों से फंस रहा था।
बार-बार पत्थर निकलने की घटना और मछुआरे के सपने की बात सुनने के बाद ग्रामीणों ने उसे मां दुर्गा का प्रतीक मान लिया। इसके बाद उस पत्थर को माता के स्वरूप में स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की गई। ग्रामीणों ने माता को जलेश्वरी नाम दिया। तभी से भवनपुरा में जलेश्वरी माता की पूजा की परंपरा चली आ रही है।
प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा करती हैं मां जलेश्वरी, ग्रामीणों का विश्वास
भवनपुरा के लोगों की मां जलेश्वरी के प्रति गहरी आस्था है। ग्रामीणों का विश्वास है कि मां जलेश्वरी अपनी पंचायत के लोगों की रक्षा करती हैं और प्राकृतिक आपदाओं से गांव को बचाती हैं। इसी विश्वास के साथ लोग माता के दरबार में पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर में स्थापित पत्थर को माता का जीवंत स्वरूप मानने और उसके आकार में लगातार वृद्धि होने की मान्यता भी ग्रामीणों के बीच प्रचलित है। पीढ़ियों से चली आ रही इस लोककथा ने जलेश्वरी माता के मंदिर को भवनपुरा की धार्मिक आस्था से जोड़ रखा है।
करीब 200 साल पुरानी मानी जाने वाली यह कहानी आज भी गांव के बुजुर्गों के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचती है। मछुआरे के जाल में बार-बार पत्थर मिलने से शुरू हुई यह लोकमान्यता भवनपुरा में मां जलेश्वरी की पहचान और श्रद्धा का आधार बनी हुई है।















