


पूर्णिया। किसी मरीज की जिंदगी बचाने की कोशिश में जब चिकित्सा विज्ञान की सभी सीमाएं सामने आ जाती हैं, तब अंगदान के माध्यम से मृत्यु के बाद भी किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन बचाने की संभावना बनी रहती है। हालांकि इसके लिए केवल लोगों का अंगदान का संकल्प लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी मजबूत चिकित्सा व्यवस्था भी आवश्यक है, जो समय रहते दाता से प्राप्त अंगों को जरूरतमंद मरीज तक पहुंचा सके। सर्जन डॉ. एके गुप्ता ने अंगदान की मौजूदा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे जागरूकता से आगे बढ़ाकर स्वास्थ्य व्यवस्था का मजबूत हिस्सा बनाने की जरूरत बताई है।

डॉ. गुप्ता के अनुसार अंगदान में समय की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संभावित दाता की पहचान, चिकित्सकीय जांच, आवश्यक प्रक्रिया, अंगों का सुरक्षित संरक्षण और उन्हें प्रत्यारोपण केंद्र तक पहुंचाने में हुई देरी किसी मरीज के लिए उपलब्ध जीवन की संभावना को समाप्त कर सकती है। इसलिए अस्पतालों में प्रशिक्षित अंगदान समन्वयक, स्पष्ट प्रोटोकॉल, तेज सूचना तंत्र और सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अंगदान की वास्तविक परीक्षा केवल बड़े शहरों में नहीं, बल्कि छोटे शहरों और जिला अस्पतालों में होगी। वहां संभावित दाता की समय पर पहचान हो, संबंधित केंद्र को तत्काल सूचना मिले और आगे की प्रक्रिया बिना अनावश्यक देरी के शुरू हो सके, इसके लिए जिला स्तर पर मजबूत नेटवर्क तैयार करना होगा। केवल बड़े शहरों में प्रत्यारोपण केंद्रों की संख्या बढ़ाने से पूरी व्यवस्था मजबूत नहीं होगी।
नेत्रदान को भी अंगदान की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए डॉ. गुप्ता ने अस्पतालों, नेत्र विशेषज्ञों और नेत्र बैंकों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद किसी व्यक्ति की कॉर्निया दूसरे व्यक्ति को दृष्टि दे सकती है। इसलिए नेत्रदान की प्रक्रिया को भी अधिक व्यावहारिक और सुलभ बनाने की जरूरत है।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि अंगदान की सबसे संवेदनशील कड़ी परिवार होता है। प्रियजन की मृत्यु के तत्काल बाद परिवार भावनात्मक रूप से कठिन स्थिति में रहता है। ऐसे समय में प्रशिक्षित टीम द्वारा संवेदनशील तरीके से संवाद किया जाना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति ने जीवनकाल में अंगदान की इच्छा दर्ज की है, तो उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए परिवार को पूरी प्रक्रिया सरल और स्पष्ट तरीके से समझाई जानी चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि विधिवत अंगदान की सहमति देने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद यदि उसके अंग प्रत्यारोपण योग्य पाए जाते हैं, तो दाता परिवार को सरकार की ओर से निश्चित आर्थिक सहायता देने पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अंग की कीमत नहीं, बल्कि परिवार के मानवीय योगदान के सम्मान के रूप में सहायता होनी चाहिए। अंगों की खरीद-बिक्री की किसी भी संभावना को इससे पूरी तरह अलग रखना होगा।
डॉ. गुप्ता ने यह भी कहा कि भविष्य में यदि दाता परिवार के किसी सदस्य को प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ती है, तो सभी चिकित्सकीय मानदंड समान होने की स्थिति में दाता परिवार के योगदान को किसी नीति के तहत मान्यता दी जा सकती है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्यारोपण में रक्त समूह, ऊतक मिलान, बीमारी की गंभीरता और अन्य वैज्ञानिक मानदंड सर्वोच्च रहेंगे।
उन्होंने कहा कि अंगदान की सफलता केवल संकल्प-पत्रों की संख्या से नहीं, बल्कि बचाई गई जिंदगियों से तय होनी चाहिए। इसके लिए जागरूकता के साथ ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें दाता की इच्छा का सम्मान हो, परिवार को भरोसा मिले और समय रहते अंग जरूरतमंद मरीज तक पहुंच सके।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि मृत्यु को रोकना संभव नहीं है, लेकिन मृत्यु के बाद बचाई जा सकने वाली जिंदगी को व्यवस्था की कमजोरी के कारण खोने से रोकना निश्चित रूप से संभव है।
















