


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बाढ़ के पानी से घर छूटे तो चिंता सिर्फ रहने और खाने की नहीं होती। बच्चों की सुरक्षा, बीमारी का डर, भविष्य की चिंता और बदले हालात का मानसिक दबाव भी लोगों को परेशान करता है। इसी को देखते हुए भागलपुर स्वास्थ्य विभाग ने राहत शिविरों में शरीर के साथ मन की सेहत पर भी ध्यान देना शुरू किया है। शनिवार को बरारी स्थित पॉलीटेक्निक कॉलेज बाढ़ राहत शिविर में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया। बाढ़ जैसी आपदा के दौरान होने वाले तनाव, घबराहट, डर, नींद में परेशानी और मानसिक दबाव से निपटने के उपाय बताए गए।
स्वास्थ्यकर्मियों ने लोगों से अपनी परेशानियों को परिवार और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ साझा करने की अपील की। जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय और मनोसामाजिक सहायता लेने के लिए भी प्रेरित किया गया।
30 साल के बाद बीपी-शुगर की भी पड़ताल:
राहत शिविर में सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य की बात नहीं हुई। 30 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की गैर-संचारी रोगों (NCD) की स्क्रीनिंग भी की गई।

अभियान के दौरान उच्च रक्तचाप और मधुमेह की जांच के साथ कैंसर के संभावित लक्षणों के बारे में भी लोगों को जानकारी दी गई। जांच में संदिग्ध पाए गए लोगों को आगे की जांच और इलाज के लिए स्वास्थ्य संस्थानों से जोड़ा जा रहा है।
जिनकी दवा चल रही, उनकी चिंता भी जरूरी:
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने बताया कि आपदा की स्थिति में राहत पहुंचाने के साथ उन लोगों पर विशेष ध्यान जरूरी है, जो पहले से किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं। बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और अन्य संवेदनशील लोगों की स्वास्थ्य जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी वजह से राहत शिविरों में स्वास्थ्यकर्मी नियमित रूप से लोगों की समस्याओं का आकलन कर रहे हैं और जरूरत के अनुसार चिकित्सा सहायता उपलब्ध करा रहे हैं।
अभियान में गैर-संचारी रोग पदाधिकारी डॉ. पंकज मनस्वी, जिला कार्यक्रम प्रबंधक मणि भूषण झा, जिला लेखा प्रबंधक सोमेश झा और मनोवैज्ञानिक निशांत कुमार समेत स्वास्थ्य विभाग की टीम शामिल रही।
राहत का मतलब सिर्फ खाना नहीं:
बाढ़ के बीच स्वास्थ्य विभाग का यह अभियान एक महत्वपूर्ण पहल की ओर इशारा करता है। राहत शिविरों में रहने वाले लोगों के लिए भोजन और सुरक्षित ठिकाने के साथ मानसिक सुकून और बीमारी की समय पर पहचान भी उतनी ही जरूरी है।

















