


राज्यपाल ने लॉन्च किए ‘ब्लू टी’, कटहल बीज आटा, ‘हनी स्पून’ और AI चैटबॉट ‘एग्री-ग्रंथ’; किसानों, शोध और नवाचार पर रहा पूरा फोकस
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर का 17वां स्थापना दिवस इस बार केवल औपचारिक समारोह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कृषि शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के नए विज़न का मंच बन गया। समारोह में परंपरा और आधुनिक तकनीक का ऐसा संगम देखने को मिला, जहां एक ओर विश्वविद्यालय की 118 वर्ष पुरानी विरासत को याद किया गया, वहीं दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चैटबॉट ‘एग्री-ग्रंथ’ और विश्वविद्यालय के शोध से विकसित उत्पादों का लोकार्पण भविष्य की कृषि की झलक बनकर सामने आया।
कर्पूरी सभागार में आयोजित समारोह में बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन और कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा वर्चुअल माध्यम से जुड़े। वहीं ग्रामीण विकास एवं सूचना-जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार, भागलपुर सांसद अजय कुमार मंडल और कहलगांव विधायक शुभानंद मुकेश की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।
अपने संबोधन में राज्यपाल ने कहा कि विश्वविद्यालय ने NAAC की ‘A’ ग्रेड मान्यता और जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों के विकास के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि स्थापना दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारियों का भी स्मरण कराता है।
समारोह का सबसे आकर्षक क्षण तब आया, जब राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के अनुसंधान से विकसित अपराजिता के फूलों से बनी ब्लू टी, कटहल के बीजों का आटा, हनी स्पून और किसानों की सहायता के लिए तैयार AI आधारित चैटबॉट ‘एग्री-ग्रंथ’ का विमोचन किया। इससे विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं से निकलकर बाजार और किसानों तक पहुंचती तकनीक की तस्वीर स्पष्ट हुई।
कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि विश्वविद्यालय पिछले 16 वर्षों में कृषि अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और किसानोन्मुखी तकनीकों के विकास का मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। उन्होंने दोहराया कि ‘समृद्ध किसान ही समृद्ध बिहार और विकसित भारत की सबसे मजबूत आधारशिला हैं।’
ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि किसी संस्थान की उपलब्धियां उसकी उम्र से नहीं, बल्कि उसके कार्यों से मापी जाती हैं और बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने कम समय में बड़ी उपलब्धियां अर्जित की हैं।
कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि किसी कृषि विश्वविद्यालय की सफलता का वास्तविक पैमाना भवन या शोध-पत्र नहीं, बल्कि वे किसान हैं जिनका जोखिम कम हुआ, वे विद्यार्थी हैं जिनका भविष्य मजबूत हुआ और वे गांव हैं जहां विज्ञान ने आय के नए अवसर पैदा किए।
समारोह में युवा शोधार्थियों को चार मिनट शोध प्रस्तुतीकरण (4MRF) प्रतियोगिता के लिए सम्मानित किया गया। उत्कृष्ट शोध प्रकाशन करने वाले शिक्षकों, श्रेष्ठ किसानों और सफल स्टार्टअप को भी सम्मान देकर विश्वविद्यालय ने शोध और नवाचार को प्रोत्साहित करने का संदेश दिया।
118 साल की विरासत, 17 साल का विश्वविद्यालय
सबौर की पहचान केवल 17 वर्ष पुराने विश्वविद्यालय की नहीं, बल्कि 1908 में स्थापित देश के सबसे पुराने कृषि शिक्षण संस्थानों में से एक की भी है। 5 अगस्त 2010 को स्वायत्त राज्य कृषि विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित बिहार कृषि विश्वविद्यालय आज 8 महाविद्यालयों, 12 अनुसंधान केंद्रों और बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित 22 कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार सेवाओं का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यही कारण है कि स्थापना दिवस का यह समारोह केवल अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि बिहार की कृषि के भविष्य की नई दिशा का भी संकेत बनकर उभरा।

















