


@ 17 किस्मों पर चल रहा था प्रयोग,कुलपति ने मौके पर जाकर देखा हाल,अब ‘बाढ़ झेलने वाली’ किस्मों पर जोर।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। गंगा का बढ़ता जलस्तर अब सिर्फ खेतों और गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि विज्ञान के उस मैदान तक पहुंच गया है जहां भविष्य की खेती तैयार की जाती है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) के अधीन बिहार कृषि महाविद्यालय के प्रायोगिक फार्म में करीब 67 एकड़ धान की फसल पूरी तरह जलमग्न हो गई है। इससे विश्वविद्यालय के बीज उत्पादन कार्यक्रम के साथ धान पर चल रहे महत्वपूर्ण शोध को भी बड़ा झटका लगा है।

प्रायोगिक फार्म में कुल 67 एकड़ में धान की खेती की गई थी। इनमें करीब 47.85 एकड़ क्षेत्र ब्रीडर सीड प्रोडक्शन (BSP) के लिए निर्धारित था। बाढ़ का पानी भरने से इस क्षेत्र में तैयार हो रही बीज सामग्री प्रभावित हुई है। साथ ही उन प्रयोगों पर भी संकट खड़ा हो गया है, जिनके जरिए आने वाले समय के लिए बेहतर धान की किस्मों की पहचान की जा रही थी।
17 किस्मों पर चल रहा था प्रयोग:
बाढ़ की चपेट में सिर्फ सामान्य धान के खेत ही नहीं आए हैं। फार्म के एल, एम, एन, के और जे ब्लॉक भी पानी में डूब गए हैं। इन क्षेत्रों में धान की 17 अलग-अलग किस्मों पर शोध और बीज उत्पादन का काम चल रहा था।
विश्वविद्यालय के मॉडल भिट्ठी फार्म (MBF) का लगभग 10 एकड़ हिस्सा भी जलमग्न हो गया है। ऐसे में नुकसान केवल इस सीजन की फसल तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि लंबे समय से चल रहे कृषि अनुसंधान पर भी इसका असर पड़ सकता है।
कुलपति ने मौके पर जाकर देखा हाल:
बुधवार को बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डी. आर. सिंह ने विश्वविद्यालय के निदेशकों, वैज्ञानिकों और अधिकारियों के साथ बाढ़ प्रभावित प्रायोगिक फार्म का निरीक्षण किया। उन्होंने फसल के नुकसान के साथ-साथ शोध गतिविधियों और बीज उत्पादन पर पड़े प्रभाव की जानकारी ली।
निरीक्षण के दौरान भविष्य में ऐसी स्थिति से होने वाले नुकसान को कम करने पर विशेष जोर दिया गया। कुलपति ने सुझाव दिया कि वर्तमान में उगाई जा रही धान की किस्मों की समीक्षा कर ऐसी किस्मों की पहचान की जाए, जो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बेहतर ढंग से टिक सकें।
अब ‘बाढ़ झेलने वाली’ किस्मों पर जोर:
विश्वविद्यालय अब जलवायु परिवर्तन और बाढ़ जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर क्लाइमेट-रेजिलिएंट धान की किस्मों पर शोध को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। जरूरत पड़ने पर मौजूदा किस्मों में आवश्यक बदलाव करने की दिशा में भी काम किया जाएगा।
इसके अलावा फार्म में जलनिकासी व्यवस्था को मजबूत करने, ड्रेनेज चैनलों की संरचना में बदलाव, तेजी से पानी निकालने वाली प्रणाली विकसित करने और निचले इलाकों में बाढ़ का पानी प्रवेश करने से रोकने के लिए दीर्घकालिक संरचनात्मक उपायों पर विचार किया जा रहा है।
कुलपति के अनुसार, भविष्य में नुकसान कम करने के लिए केवल फसल बदलना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए फसल प्रबंधन, उपयुक्त किस्म का चयन, बुआई के समय में बदलाव, प्रभावी जलनिकासी और बाढ़ नियंत्रण – इन सभी पहलुओं को एक साथ लेकर रणनीति बनानी होगी।
यानी इस बार गंगा का पानी खेतों में सिर्फ फसल नहीं डुबोकर गया है, बल्कि उसने कृषि वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है – क्या बदलते मौसम और बढ़ती बाढ़ के दौर में खेती का तरीका भी बदलना होगा?

















