


पूर्णिया । पूर्णिया जिले के अमौर प्रखंड स्थित ऐतिहासिक गांव हरिपुर में भारत सरकार के ‘ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि संरक्षण मिशन’ के तहत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। गांव के प्रतिष्ठित काजी परिवार के पास संरक्षित करीब 100 वर्ष पुरानी अरबी, फारसी और उर्दू भाषा की दुर्लभ पांडुलिपियां, ऐतिहासिक दस्तावेज और पुराने पत्रों की पहचान की गई है। इन अमूल्य धरोहरों को संरक्षित करने के लिए अब उनका डिजिटलीकरण कर राष्ट्रीय पोर्टल पर अपलोड किया जा रहा है, ताकि भावी पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक विरासत से परिचित हो सकें।

इस संबंध में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज कुमार पटेल के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रशासनिक एवं तकनीकी टीम हरिपुर पहुंची। टीम ने काजी परिवार के पास सुरक्षित रखी गई पांडुलिपियों और दस्तावेजों का गहन निरीक्षण किया। मिशन का उद्देश्य क्षेत्र में बिखरी हुई प्राचीन ज्ञान परंपरा, ऐतिहासिक अभिलेखों और दुर्लभ लिपियों को खोजकर उनका संरक्षण सुनिश्चित करना है।
निरीक्षण के दौरान टीम को कई महत्वपूर्ण पांडुलिपियां और दस्तावेज प्राप्त हुए, जिनमें धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों से संबंधित सामग्री होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दस्तावेजों से न केवल सीमांचल क्षेत्र के इतिहास पर नई रोशनी पड़ेगी, बल्कि तत्कालीन समाज, शिक्षा, संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी सामने आ सकती हैं।

पांडुलिपियों की भाषा और विषयवस्तु को समझने के लिए उर्दू अनुवादक वसीम अहमद अलीमी और सहायक उर्दू अनुवादक अब्दुल गनी को विशेष रूप से टीम में शामिल किया गया। दोनों विशेषज्ञों ने प्रारंभिक अध्ययन के दौरान कई दस्तावेजों की ऐतिहासिक उपयोगिता को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अरबी, फारसी और उर्दू में लिखी गई इन पांडुलिपियों का अनुवाद और दस्तावेजीकरण किए जाने के बाद इनके वास्तविक ऐतिहासिक महत्व का पता चल सकेगा।
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज कुमार पटेल ने बताया कि भारत सरकार द्वारा संचालित ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ का मुख्य उद्देश्य देशभर में निजी परिवारों, संस्थानों और धार्मिक स्थलों में सुरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों की खोज, सूचीकरण, डिजिटलीकरण और संरक्षण करना है। उन्होंने कहा कि हरिपुर में मिली सामग्री इस मिशन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसके संरक्षण की दिशा में आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
उन्होंने बताया कि डिजिटलीकरण के बाद इन दस्तावेजों को राष्ट्रीय पांडुलिपि पोर्टल पर सुरक्षित रखा जाएगा, जिससे शोधार्थियों, इतिहासकारों और विद्यार्थियों को अध्ययन एवं अनुसंधान में सहायता मिल सकेगी। साथ ही मूल दस्तावेजों के संरक्षण के लिए भी आवश्यक तकनीकी उपाय किए जाएंगे।
स्थानीय लोगों ने भी इस खोज को क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बताया है। ग्रामीणों का कहना है कि हरिपुर गांव लंबे समय से शिक्षा, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं का केंद्र रहा है। ऐसे में यहां से दुर्लभ पांडुलिपियों का मिलना इस ऐतिहासिक पहचान को और मजबूत करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के सर्वेक्षण लगातार जारी रहे तो सीमांचल क्षेत्र में छिपी हुई कई अन्य ऐतिहासिक धरोहरें भी सामने आ सकती हैं, जो भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
















